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#धमाका_डिफरेंट: कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट अर्पित वर्मा ने कोलारस के साथ परखी बदरवास के सरकारी गलियारों की व्यवस्थाएं, दिए आवश्यक निर्देश

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* औचक निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का लिया जायजा
* जिले की नब्ज टटोलने निकल पड़े अर्पित वर्मा
शिवपुरी, 14 अप्रैल 2026। किसी भी जिले को सफलता पूर्वक चलाने के लिए उस जिले के लोगों, अधिकारियों, कर्मचारियों से मिलकर इलाके को समझना आवश्यक है। शायद इस बात को बेहतर समझने वाले जिले के नवागत कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट अर्पित वर्मा ने आज मंगलवार को कोलारस एवं बदरवास क्षेत्र का दौरा किया। साथ ही यहां स्थित विभिन्न कार्यालयों एवं स्वास्थ्य संस्थानों का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने व्यवस्थाओं का जायजा लेते हुए संबंधित अधिकारियों को दिशा-निर्देश प्रदान किए। कलेक्टर वर्मा ने निरीक्षण की शुरुआत एसडीएम कार्यालय कोलारस से की।
इसके पश्चात तहसील कार्यालय कोलारस का निरीक्षण कर साफ-सफाई, अभिलेखों के सुव्यवस्थित संधारण, लंबित प्रकरणों के त्वरित निराकरण एवं डायवर्सन की वसूली सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
इसके उपरांत कलेक्टर ने सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र कोलारस का निरीक्षण किया। उन्होंने जनरल वार्ड में भर्ती मरीजों एवं उनके परिजनों से संवाद कर स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी ली तथा व्यवस्थाओं के संबंध में फीडबैक प्राप्त किया। प्रसूति वार्ड में पहुंचकर प्रसूताओं एवं उनके परिजनों से आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता के संबंध में जानकारी ली।
कलेक्टर ने स्वास्थ्य केन्द्र परिसर स्थित पोषण पुनर्वास केन्द्र का भी निरीक्षण किया तथा वहां भर्ती बच्चों की स्थिति की जानकारी ली। उन्होंने उपस्थित हितग्राहियों से मिल रही सेवाओं के संबंध में चर्चा की तथा स्वास्थ्य केन्द्र में उपलब्ध दवाओं एवं टीकाकरण, विशेष रूप से एंटी रैबीज एवं एचपीवी वैक्सीन की उपलब्धता की जानकारी ली।
निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने बदरवास तहसील कार्यालय का भी दौरा किया, जहां साफ-सफाई, प्रकाश व्यवस्था सुदृढ़ करने एवं मीटिंग हॉल पर आवश्यक नाम पट्टिका स्थापित करने के निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए।
इस अवसर पर एसडीएम कोलारस अनूप श्रीवास्तव, तहसीलदार कोलारस, बीएमओ संजय राठौर सहित अन्य अधिकारी, चिकित्सक एवं स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे।
कलेक्टर अर्पित की कलम से
आज शिवपुरी जिले के भ्रमण पर निकला तो मन में जो छवि थी, हकीकत उससे कहीं अधिक सुंदर और आत्मीय मिली। 
इस दौरान कोलारस और बदरवास क्षेत्र के विभिन्न कार्यालयों एवं स्वास्थ्य संस्थानों का औचक निरीक्षण किया। व्यवस्थाओं और स्वास्थ्य सुविधाओं का जायजा लिया।
यहां के लोगों की सादगी, उनका व्यवहार और चेहरे पर सजी सहज मुस्कान ने दिल को छू लिया। ऐसा लगा जैसे मैं किसी प्रशासनिक दौरे पर नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के बीच आया हूँ।
Collector Shivpuri , PRO Shivpuri , CM Madhya Pradesh, Jansampark Madhya Pradesh














#धमाका_डिफरेंट_खबर: पुरुष बूढ़ा होता है, स्त्री परिपक्व होती है..पढ़िए जरा हट के

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हर वृद्ध पुरुष को इसे पढ़कर चिंतन अवश्य करना चाहिए।
1. पुरुष बूढ़ा होता है, जबकि स्त्री परिपक्व होती है।
2. जैसे ही पुरुष अपने बच्चों की शादी कर देता है और परिवार की आर्थिक नींव मजबूत कर देता है, परिवार में उसका वरिष्ठ और सम्मानित स्थान धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
3. इसके बाद उसे बोझ समझा जाने लगता है — चिड़चिड़ा, गुस्सैल और अनिश्चित स्वभाव वाला बूढ़ा व्यक्ति।
4. जिन कठोर निर्णयों से उसने कभी पत्नी और बच्चों के लिए व्यवस्था बनाई थी, आज उन्हीं निर्णयों की चीर-फाड़ होकर आलोचना होती है; एक न एक कारण से उसे दोषी ठहरा दिया जाता है। और यदि वास्तव में उससे कोई गलती हुई हो — तो भगवान ही रक्षा करे।
5. वृद्ध स्त्री को, इसके विपरीत, बच्चों और बहुओं से सहानुभूति मिलती है — क्योंकि उसके माध्यम से अभी भी कई काम करवाने होते हैं।
6. सही समय आने पर वह समझदारी से पति के पक्ष से बच्चों के पक्ष में चली जाती है।
7. जब पति उम्र में बड़ा हो, तो पत्नी बहू के साथ तालमेल बना लेती है, ताकि बेटा उससे दूर न हो और उसकी देखभाल करता रहे।
8. पुरुष ने जीवन में चाहे कितनी ही महान उपलब्धियाँ हासिल की हों — बुढ़ापे में वे किसी काम नहीं आतीं।
9. जबकि वृद्ध स्त्री अपने पुराने पुण्यों का ब्याज जीवन भर पाती रहती है।
10. जिन लोगों के पास पैतृक संपत्ति या खेती होती है (जिसकी बच्चों को अब भी इच्छा रहती है) उनकी स्थिति थोड़ी बेहतर होती है। लेकिन जिन्होंने भविष्य के झगड़ों से बचने के लिए समय से पहले संपत्ति बाँट दी — वे अक्सर उपरोक्त ही दुःखद स्थिति का सामना करते हैं। इसलिए संपत्ति समय से पहले न बाँटना ही बेहतर है।
11. किसी भी अस्पताल में चले जाएँ , रिश्तेदारों की आँख देखकर ही पता चल जाता है कि भर्ती वृद्ध पुरुष है या वृद्ध स्त्री। यदि वृद्ध पुरुष हो, तो उसकी बेटी को छोड़कर शायद ही किसी की आँख नम होती है।
12. निष्कर्ष: जैसे ही पुरुष वृद्ध होता है, उसे सीख लेना चाहिए कि दूसरों से किसी भी प्रकार की अपेक्षा न रखे। याद रखें , मनुष्य जीवन भर विद्यार्थी है। समझ लें कि इस संसार में कोई किसी का नहीं है। विरक्ति, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान के साथ जीना सीखें।
13. सुझाव:
आपने दूसरों के लिए क्या-क्या किया , यह सोचना भी छोड़ दें, और इस बारे में बात करना भी बंद कर दें।
14. प्राचीन शास्त्रों में कहीं भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि किसी स्त्री ने वानप्रस्थ या संन्यास ग्रहण किया हो।
15. ये आश्रम केवल पुरुषों के लिए निर्धारित थे। इनके महत्व को समझें, तब ज्ञात होगा कि हमारे पूर्वज कितने दूरदर्शी थे।

मैं कौन हूँ?
सेवानिवृत्ति के बाद,
न नौकरी,
न कोई दिनचर्या,
और घर की चुप्पी...

तभी मैंने स्वयं को पहचानना शुरू किया।
मैं कौन हूँ?
कोठियाँ बनाईं,
फार्महाउस खड़े किए,
छोटे-बड़े अनेक निवेश किए,
और आज…
चार दीवारों के भीतर सीमित हो गया हूँ।साइकिल से मोपेड,
मोपेड से बाइक,
बाइक से कार , गति और शान का पीछा किया,
पर अब कमरे के भीतर
धीरे-धीरे अकेले चलता हूँ।
प्रकृति मुस्कुराकर पूछती है।
“कौन हो तुम, मेरे मित्र?”
और मैं कहता हूँ,
मैं... बस मैं।
दुनिया के कई राज्य, देश और महाद्वीप देखे,
पर आज मेरी यात्रा
ड्रॉइंग रूम से किचन तक है।
संस्कृतियाँ-परंपराएँ समझीं,
पर अब मन
बस अपने परिवार को समझना चाहता है।
प्रकृति हँसकर फिर पूछती है ,
“कौन हो तुम, मेरे मित्र?”
और मैं कहता हूँ,
“मैं... बस मैं।”
कभी जन्मदिन, सगाई, विवाह — सब धूमधाम से मनाए, आज बस अच्छी नींद और भूख लगना ही
मेरी खुशी है।
प्रकृति पूछती है,
“कौन हो तुम?”
और मैं उत्तर देता हूँ —
“मैं... बस मैं।”
सोना-चाँदी-हीरे जवाहरात
लॉकरों में सो रहे हैं।
सूट-ब्लेज़र
अलमारियों में ठहरे हैं।
और मैं ,
नर्म सूती कपड़ों में,
सरल और स्वतंत्र।अंग्रेज़ी-फ्रेंच-हिंदी सब सीखी,पर अब
माँ की बोली में बात करने में सुकून मिलता है।
काम के लिए अनगिनत यात्राएँ कीं,
और अब
उन फायदों-नुकसानों को
सिर्फ यादों में तौलता हूँ।
व्यवसाय चलाए,
परिवार सँवारा,
अनेकों संबंध बनाए,
और आज
सबसे सच्चा साथी
पास का पड़ोसी है।
कभी हर नियम का पालन किया,
शिक्षा के पीछे भागा —
पर अब जाकर समझ आया कि वास्तविक मायने क्या हैं।
जीवन के उतार-चढ़ाव के बाद, शांत क्षण में
आत्मा ने कहा,
बस अब…तैयार हो जाओ,
हे यात्री…
अंतिम यात्रा की तैयारी का समय आ गया है…

प्रकृति ने कोमलता से पूछा
“कौन हो तुम, मेरे मित्र?”
और मैंने कहा —
हे प्रकृति,
तुम ही मैं हो…
और मैं ही तुम हूँ।
कभी आकाश में उड़ता था, आज धरती को नम्रता से छूता हूँ।
क्षमादान दो…
एक और अवसर दो जीने का…
पैसे कमाने की मशीन नहीं,
बल्कि एक सच्चे इंसान के रूप में, मूल्यों के साथ,
परिवार के साथ,
प्रेम के साथ।
भूमिका पांडे की फेसबुक वॉल से साभार।













#धमाका_खास_खबर: "बचपन" पर "भारी" 'बस्ता': तीसरी क्लास के बच्चे के बैग का वजन 5.5 किलो, प्रिंसिपल की पहल से मिली राहत

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शिवपुरी। छोटे बच्चों की पीठ पर बस्ते का बोझ उनकी सेहत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में एक जागरूक अभिभावक ने जब अपनी तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली बेटी के बैग का वजन किया, तो वह 5.5 किलोग्राम निकला, जो कि निर्धारित सरकारी मानकों से दोगुने से भी अधिक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, स्कूल बैग का वजन बच्चे के कुल भार के 10% से अधिक नहीं होना चाहिए। इस मामले में अभिभावक के निवेदन के पश्चात प्रिंसिपल ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दैनिक विषयों की संख्या 7 से घटाकर 5 कर दी है, जिससे बैग का वजन कम होकर 4 किलो रह गया है। हालांकि, स्वास्थ्य मानकों के अनुसार कक्षा 3 के लिए यह अब भी 3 किलो से कम होना चाहिए।
अभिभावकों के लिए संदेश:
शिक्षण संस्थानों और पालकों को मिलकर प्रयास करने होंगे। कॉपियों की संख्या सीमित करना, स्कूल में बुक-शेल्फ की व्यवस्था और हल्की पानी की बोतलों का उपयोग कर इस बोझ को कम किया जा सकता है। याद रखें, भारी बस्ता बच्चों में रीढ़ की हड्डी और कंधों के दर्द जैसी स्थायी समस्याएं पैदा कर सकता है।
बच्चों की पीठ पर भारी बस्ते का बोझ एक गंभीर मुद्दा है, जो उनके स्वास्थ्य, रीढ़ की हड्डी और एकाग्रता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। जानकारों के अनुसार, इसका मुख्य कारण सिलेबस का बढ़ना और अतिरिक्त किताबें ले जाना है, जिससे बच्चों को थकान और पीठ में दर्द जैसी समस्याएं होती हैं।
स्वास्थ्य पर प्रभाव:
भारी बस्ते से कंधों और पीठ में दर्द, मांसपेशियों में खिंचाव, और झुककर चलने की समस्या हो सकती है।
समाधान
स्कूल प्रशासन और अभिभावकों को मिलकर वजन कम करने के लिए कदम उठाने चाहिए, जैसे कि किताबें स्कूल में ही रखना या ई-बुक्स का उपयोग करना।
गाइडलाइन्स
मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के अनुसार, पहली और दूसरी कक्षा के लिए बस्ते का वजन 1.5 किलो से कम होना चाहिए, और तीसरी से पांचवीं के लिए यह 2 से 3 किलो तक हो सकता है।
दार्शनिक दृष्टिकोण
बस्ते का बोझ तो पीठ सह लेती है, लेकिन अपेक्षाओं का बोझ (अंकों का दबाव) बच्चों के लिए कहीं ज्यादा चिंताजनक है। इसलिए भारी बस्ते के बोझ को कम करने के लिए, बच्चों को केवल आवश्यक किताबें ही स्कूल ले जानी चाहिए।













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