विचारधारा दल के नही राष्ट्र के प्रति समर्पित होना चाहिए:पराड़कर
शिवपुरी। अखिल भारतीय साहित्य परिषद इकाई शिवपुरी द्वारा राष्ट्रीय संगठन मंत्री साहित्य परिषद व वरिष्ठ लेखक विचारक श्रीधर पराड़कर की पुस्तकों का लोकार्पण व विमर्श कार्यक्रम होटल सनराइज में आयोजित किया गया, जिसमे लखनलाल खरे लिखित शब्द बीनते हुए व ब्रजलता शर्मा नोयडा की पुस्तक शोध सुरभि का भी लोकार्पण किया गया।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठनमंत्री श्रीधर पराड़कर ने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि की आसंदी से बोलते हुए कहा कि विचारधारा दल के प्रति नही बल्कि राष्ट्र के प्रति समर्पित होना चाहिए,आज जितनी भी समस्याएं देखते है उनके मूल में यही विषय है। राष्ट्र से ऊपर कुछ नही हो सकता, विचारधाराएं भी राष्ट्र में ही तो समाहित है, राष्ट्र रहेगा तभी तो विचार और विचारधारा रहेगी।साहित्यकार को अपने धर्म का भान होना चाहिए, भारतीय संस्कृति और महापुरुष सदैव हमे प्रेरणा देते है, हमारा इतिहास इस बात का साक्षी है। राष्ट्र निर्माण में साहित्यकार का महत्वपूर्ण योगदान होता है,इस कारण साहित्यकार को सदैव राष्ट्र को सर्वोपरि मान सृजन करते रहना चाहिए।श्रीधर ने कहा कि कोरोना काल की वजह से काफी व्यवधान रहे, कार्यक्रम ऑनलाइन ही जारी रहे, शिवपुरी इकाई द्वारा अभी जो कार्यक्रम एक साथ तीनो पुस्तको का लोकार्पण और समीक्षा का कार्यक्रम रखा वह प्रशंसनीय है।
श्रीधर पराड़कर द्वारा लिखित पुस्तक इतिहास की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री ऋषिकुमार मिश्रा ने कहा कि भारतीय इतिहास अपने आप मे महत्वपूर्ण है,जिससे गौरव का भान होता है,जो पीढ़ी अपनी संस्कृति अपने इतिहास से विमुख हो जाती है उसका पतन हो जाता है,श्रीधर जी ने बेहतर तरीके से पुस्तक में इस विषय को रेखांकित किया है।
श्रीधर पराड़कर की पुस्तक डॉ अंबेडकर और जोगेंद्र नाथ मंडल की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए डॉ कुमार संजीव ने कहा कि आजादी से पूर्व भारतीय राजनीति में दलित चेतना के दो प्रमुख आधार स्तम्भ डॉ भीमराव अंबेडकर और जोगेंद्रनाथ मंडल थे,दोनो ही आजादी के बाद क्रमशः भारत और पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री बने,परन्तु जहाँ डॉ भीमराव अंबेडकर भारत रत्न होकर पूज्य बाबा साहब के नाम से जन जन की स्मृति में साक्षी हो गए तो जोगेंद्र नाथ मंडल को पाकिस्तान सरकार में इस्तीफा देना पड़ा और गुमनामी के अंधेरे में खो गए,ये शोध उक्त पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत होता है।
श्रीधर पराड़कर लिखित तीसरी पुस्तक साहित्य का धर्म की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए डॉ लोकेश तिवारी ने कहा कि संस्कृति के उत्थान के लिए साहित्य एवं साहित्यकार को सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए,उसके कर्म और सृजन से मानवजाति को पाथेय प्रदान करना चाहिए।आगे बोलते हुए तिवारी ने कहा कि साहित्यकार समाज और संस्कृतिजीवी होने के कारण निरपेक्ष तो नही हो सकता किंतु अपनी उत्कृष्ट चिंतन प्रक्रिया के माध्यम से कालजयी रचना सृजन में सदैव समर्थ होता है,साहित्य का धर्म साहित्य के केंद्रबिंदु होकर अनुकरणीय रचना है।कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार पुरषोत्तम गौतम ने करी।अतिथियो का स्वागत उद्बोधन कार्यक्रम संयोजक साहित्य परिषद के जिलाध्यक्ष आशुतोष शर्मा ने दिया, कार्यक्रम का संचालन अरुण अपेक्षित ने किया, आभार रंजीता देशपांडे ने माना। द्वतीय सत्र में कवि सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमे मुख्य अतिथि नरेशप्रताप सिंह बॉबी राजा,नरेश पाराशर एस डी ओ सिंचाई विभाग,व अध्यक्षता सी पी वर्मा एस डी ओ लोक निर्माण विभाग ने की, जिसका संचालन सलीम बादल ने किया। कविता पाठ अरुण अपेक्षित, दिनेश वशिष्ठ, प्रदीप सुकून, इशरत ग्वालियरी,श्याम शास्त्री,समीक्षा भार्गव,वैशाली पाल,रमन शर्मा,रामकृष्ण मौर्य,भगवान सिंह यादव,अमित शर्मा रन्नौद, घनश्याम शर्मा बदरवास इरशाद खान,आदि ने किया।

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