राधिका पैलेसे की पुलिस चौकी से लेकर माधवपुरा की पुलिया तक बन रही है सडक
-ठेकेदार द्वारा सडक निर्माण में उपयोग किया गया मलवा और कचरा
मुरैना। (अजय दण्डौतिया की रिपोर्ट) शहर के राधिका पैलेस की पुलिस चौकी से लेकर माधवपुरा की पुलिया तक रोड निर्माण का कार्य किया जा रहा है। लेकिन उक्त रोड पर गिट्टी की जगह कचरे और मलवे का उपयोग किया जा रहा है। रोड बनाने वाले ठेकेदार द्वारा उक्त सडक की नीव ही घटिया स्तर पर की जा रही है। सडक बनाने में इस्तेमाल किये गये मलवे और कचरे के ऊपर ठेकेदार द्वारा गिट्टी डाल दी गई है जिससे उसकी काली करतूत छुप जाये।
जानकारी के अनुसार राधिका पैलेसे की पुलिया से लेकर माधवपुरा की पुलिय तक सडक निर्माण का कार्य किया जा रहा है। इस सडक निर्माण की शुरूआत में ही घटिया निर्माण कार्य देखा जा सकता है। उक्त सडक पर गिट्टी की जगह मलवे और कचरे का उपयोग भराव के लिये किया जा रहा है। ठेकेदार द्वारा उक्त मलवा और कचरा नगर निगम द्वारा शहर से उठाये गये सभी मलवे और कचरे के एक स्थान पर खाली करने की जगह से उठाया जा रहा है। ऐसा ठेकेदार इसलिये कर रहा है क्योंकि उक्त मलवे और कचरे की एक ट्रॉली 200 से 500 रूपये तक में मिल जाती है और गिट्टी की ट्रॉली 1000 से 2000 तक की आती है। रूपयों को बचाने के चक्कर में ठेकेदार द्वारा उक्त सडक पर केवल मलवा और कचरा ही डाला जा रहा है। जब सडक का भराव पूरी तरह से हो गया तो ठेकेदार ने अपनी काली कमाई की करतूत को छुपाने के लिये मलवे के ऊपर गिट्टी डाल दी जिससे वह पूरी तरह छुप गया। सूत्रों द्वारा बताया जा रहा है कि उक्त सडक पर टेण्डर के स्टीमेट के हिसाव से बिल्कुल भी कार्य नहीं किया जा रहा है लेकिन कमीशनखोरी के चलते नगर निगम उक्त ठेकेदार पर मेहरवान बना हुआ है।एक नजर नगर निगम की कमीशनखोरी की प्रक्रिया पर
ठेकेदारों की मानें तो नगर निगम कमीशनखोरी के चलते बदनाम बना हुआ है। जब भी नगर निगम से कोई ठेकेदार द्वारा किसी कार्य का ठेका लिया जाता है तो कार्य फाइनल होते ही नगर निगम के सभी कमीशनखोरों का कमीशन तय हो जाता है। एक ठेकेदार ने आरोप लगाया कि नगर निगम में कमीशन इस प्रकार देना पड़ता है - सबसे पहले नगर निगम कमिश्रर जिनका कमीशन टेण्डर की पूरी राशि का 10 प्रतिशत होता है! यह कमीशन ठेकेदार के पैमेंट पर साइन करने के लिए लिया जाता है! इसके बाद आते हैं नगर निगम के इंजीनियर जो ठेकेदार के हिसाव से अपना कमीशन तय करते हैं! यह ठेकेदार दबंग हुआ तो 5 प्रतिशत नहीं तो 10 प्रतिशत इंजीनियर का फिक्स होता है। यह कमीशन इंजीनियर द्वारा कार्य की गुणवत्ता को सही बताने के लिये लिया जाता है। इसके बाद नंबर आता है एकाउंटेंट यानि लेखाधिकारी जो ठेकेदार की नोटशीट बनाने से लेकर चैक तक का कार्य पूर्ण करावाता है! इसके लिये एकाउंटेंट द्वारा 3 से 5 प्रतिशत टेण्डर की राशि में से ली जाती है! आखरी में आता है विभाग का चपरासी जो 500 या 1000 रूपये तक लेता है। इसका काम केवल फाइलों को अधिकारियों कर्मचारियों तक पहुंचाने का रहता है। इस तरह टेण्डर राशि का लगभग 25 से 30 प्रतिशत भाग कमीशनखोरी की भेंट चढ जाता है इसके बाद बचे हुए पैसों से ठेकेदार द्वारा निर्माण कार्य करवाया जाता है जिसमें से 30 से 40 प्रतिशत राशि ठेकेदार भी बचा लेता है। जिससे किये हुये निर्माण कार्य बेहद घटिया होते हैं।
नगर निगम कमिश्रर इन दिनों कथित तौर पर कमीशनखोरी की अपनी मोटी कमाई को तरीके से सूतने में लगे हुए हैं। यही वह कारण है कि वह अपने चम्बर में कभी दिखते ही नहीं है हमेशा उनके चेम्बर की कुर्सी खाली पडी रहती है। इस संंबंध में जब निगम कर्मचारियों से बातचीत की गई तो उन्होंने कमिश्रर अमर सत्य गुप्ता के बैठने की तीन जगह बताई लेकिन जब घटिया सडक निर्माण के बारे में जानकारी लेने के लिये तीनों स्थानों पर जाकर देखा गया तो गुप्ता कहीं नजर नहीं आये। इसके अलावा गुप्ता से फोन पर भी संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन केवल ठेकेदारों के फोन को प्राथमिकता देने वाले गुप्ता से संपर्क नहीं हो सका। इससे साफ होता है कि गुप्ता इन दिनो कितनी मेहनत कर रहे हैं कि उनके पास अपने चेम्बर में बैठने तक का समय नहीं है।

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