शिवपुरी। (मनीष मेहरोत्रा)
पद्म भूषण कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लन (कमांडर नेहरू ब्रिगेड, आई एन ए) के सबसे प्रिय अधिकारी जिन्हें वे स्वयं से भी कई गुना ज़्यादा वीर बताते थे और उनकी शहादत का सदैव ज़िक्र किया करते थे- लेफ्टिनेंट ज्ञान सिंह बिष्ट..
कर्नल ढिल्लन साहब जब अपने अंतिम समय में यादाश्त खो चुके थे तब भी उनकी ज़ुबां पर अंतिम समय भी ज्ञान सिंह बिष्ट का नाम था..
वे खाना खाते भी तभी थे जब ज्ञान सिंह बिष्ट की तस्वीर को खाना लगा दिया जाता था।
कर्नल ढिल्लन साहब यादाश्त खो जाने के बाद अपने अंतिम समय में कहते थे- "मेरे जवानों ने पानी नहीं पिया है काफ़ी दिनों से, उन्हें पानी दो..
सबसे पहले ज्ञान सिंह बिष्ट को खाना लगाओ"
फ़िर ज्ञान सिंह बिष्ट की तस्वीर को उनके परिवाजन खाना लगाया करते थे..
अन्तिम समय में भी अपने सिपाहियों का नाम न भूलना यादाश्त खो जाने के बाद उनकी कमांडर शिप को दर्शाता है..
लेफ्टिनेंट ज्ञान सिंह बिष्ट ने अंतिम समय तक चौक बडांग इलाके में केवल 98 सैनिक होते हुए भी 13 टैंक,11 आर्मर्ड कारें व 10 ट्रकों में आ रहे फील्ड मार्शल विलियम स्लिम के सैनिकों को अंत तक रोककर रखा व उनके साथी अंतिम सांस तक लड़ते हुए टैंकों को उड़ाने के लिऐ अपने ऊपर माइन बिछाकर टैंकों के नीचे लेट गए.. ज्ञान सिंह बिष्ट लड़ते लड़ते 16 मार्च 1945 को शहीद हो गए..
ये कीमत थी आज़ादी की जो इन वीरों ने चुकाई..
और वर्तमान समय में अधिकांश भारत वासियों को इनके नाम तक नहीं मालूम, मानो कि आज़ादी खैरात में मिली हो..
ये शहीदों की कुर्बानी से मिला हुआ अनमोल प्रजातंत्र है..

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