जन जन से जुड़े बिजली के गंभीर विषय पर पढिये ख्यातिनाम लेखक
एक राष्ट्र एक राशन कार्ड, एक राष्ट्र एक टैक्स और एक राष्ट्र एक ग्रिड जैसे नवाचार यदि अमल में लाए जा सकते हैं तो -एक राष्ट्र एक बिजली दर- पर भी विचार क्यों नहीं किया जाना चाहिए? इससे देश भर में बिजली उपभोक्ताओं को सुविधा होगी। साथ ही बिजली की उपलब्धता का वितरण भी समान रूप से संभव हो सकेगा। यदि इस नीति को समग्रता से अमल में लाया जाए तो बिजली क्षेत्र में अनेक विसंगतियों को भी दूर किया जा सकता है। हाल ही में नीति आयोग की बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा इस मुद्दे को उठाया गया है, जिसके बाद यह मसला एक बार फिर चर्चा का विषय बन चुका है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और पेयजल जैसे मूलभूत विषयों की तरह बिजली भी आज जीवन और मानवीय विकास का अविभाज्य हिस्सा है। महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि देश में पर्याप्त उत्पादन के बावजूद बिजली जरूरत के मुताबिक आम आदमी को नहीं मिल पा रही है और नागरिकों को एक भेदभावमूलक वितरण व्यवस्था से जूझना पड़ता है। ऐसे में देश के बिजली सिस्टम पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सच्चाई यह है कि जिस मुद्दे को नीतीश कुमार ने उठाया है उस पर काफी पहले नीतिगत पहल अखिल भारतीय स्तर से सुनिश्चित होनी चाहिए थी। क्या कारण है कि एक ही ग्रिड से बिजली लेने वाले बिहार को महंगी और ओडिशा, तमिलनाडु को सस्ती बिजली मिलती है और इसका खामियाजा बिहार की जनता को महंगी बिजली के रूप में उठाना पड़ता है। देश भर में घरेलू एवं खेती की बिजली के लिए लोग अलग अलग दाम चुकाते हैं। नतीजन बिजली के उपभोग का इंडेक्स भी राज्यों की गरीबी-अमीरी से निर्धारित हो रहा है। बगैर बिजली के आज जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है और यह सामुदायिक विकास का एक अहम कारक भी है। ऐसे में एक समावेशी बिजली नीति की आवश्यकता देश में महसूस की जा रही है। इससे पहले हमें यह भी जान लेना चाहिए कि भारत में जितनी बिजली की आवश्यकता है, उससे कहीं अधिक समेकित उत्पादन क्षमता आज हमारे पास मौजूद है। हम विश्व के तीसरे बड़े बिजली उत्पादक राष्ट्र हैं। वर्ष 2006 से 2019 के मध्य हमारी बिजली उत्पादन क्षमता 124 गीगावाट से बढ़कर 344 गीगावाट हो चुकी है। राष्ट्रीय विद्युत योजना 2016 के अनुसार 2021-22 में देश की पीक डिमांड 235 गीगावाट होगी, जबकि 2019 में हम 344 गीगावाट उत्पादन पर पर पहुंच चुके हैं। इस सरप्लस उत्पादन के बावजूद भारत में आम आदमी हर राज्य में महंगी बिजली खरीदने के लिए विवश क्यों है? जवाब भारत का जटिल और जर्जर हो चुका बिजली तंत्र है जिसे हमने अलग अलग डिस्कॉम यानी वितरण बोर्ड या कंपनियों के भरोसे छोड़ रखा है। देश भर के डिस्कॉम दिवालिया होने के कगार पर हैं। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और बंगाल जैसे राज्यों में सरकारी निगम लाखों करोड़ के घाटे में हैं और सरकारों की सब्सिडी पर टिके हैं।
यह हमारी व्यवस्था और प्रशासन का दिवालियापन भी है कि राष्ट्रीय जरूरत से ज्यादा उत्पादन के बावजूद हमारे करोड़ों लोग पर्याप्त बिजली के लिए तरस रहे हैं। बिजली का उपभोग आज मानव विकास सूचकांक के स्वरूप को प्रभावित करता है। वैश्विक रूप से भारत तीसरा शीर्ष बिजली उत्पादक देश होने के बावजूद प्रति व्यक्ति बिजली उपभोग में पिछड़ा हुआ है। ब्रिटेन में प्रति व्यक्ति बिजली खपत 5,130 kwh है, वहीं वैश्विक रूप से यह आंकड़ा 3,130 है। लेकिन भारत में यह 1,181 ही है। यह पिछड़ापन संघीय व्यवस्था में भी अमीर और गरीब की खाई को प्रदर्शित करता है। मसलन बिहार में यह 311 है तो गुजरात में यह 2,388 है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार प्रति व्यक्ति बिजली खपत के ये आंकड़े हरियाणा में 2,229 तो तमिलनाडु में 1,849 हैं, वहीं बंगाल में 757 तो उत्तर प्रदेश में 629 और असम में 391 हैं। स्पष्ट है कि देश के कई राज्यों के लोग अन्य राज्यों की तुलना में बिजली का उपभोग बहुत ही कम अनुपात में कर रहे हैं। ये सभी राज्य मानव विकास सूचकांक में भी अन्य राज्यों से पिछड़े हुए हैं।
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी ने उपभोक्ताओं को मिलने वाली घरेलू बिजली के दामों पर कराए देशव्यापी सर्वे के आंकड़े जारी किए हैं। ये आंकड़े चार किलोवाट कनेक्शन पर आधारित हैं और प्रमाणित करते हैं कि देश में बिजली उपभोक्ता किस स्तर पर भेदभाव का शिकार हैं। केंद्र प्रशासित दमन दीव में बिजली की औसत दर 1.71 रुपये प्रति यूनिट है। इसी तरह दादरा नगर हवेली में 1.93 रुपये, गोवा में 2.43 रुपये तो चंडीगढ़ में 4.15 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली लोगों को मिलती है। दूसरी तरफ बिहार में 8.6 रुपये, आंध्र प्रदेश में 8.5 रुपये, त्रिपुरा में 7.55 रुपये प्रति यूनिट आम ग्राहक को बिजली मिलती है।
असल में राज्य के डिस्कॉम महंगी बिजली खरीदने के मकडज़ाल में राजनीतिक एवं प्रशासनिक कारणों से भी फंसे हुए हैं। खस्ताहाल वित्तीय स्थिति के लिए राज्य सरकारों की चुनावी अभिलिप्साएं, मुफ्त बिजली या अव्यावहारिक सब्सिडी भी कसूरवार हैं। विकास और निवेश के नाम पर राज्यों ने निजी पावर प्लांट अपने यहां लगवा कर वाहवाही लूटी, लेकिन इसके पीछे इन प्लांटों के साथ किए गए दीर्घकालिक बिजली खरीद सौदे किसी की नजर में नही आते हैं। मसलन मध्य प्रदेश में करीब 191 करोड़ यूनिट बिजली के परचेज एग्रीमेंट विभिन्न जेनको यानी पावर जेनरेशन कंपनियों से किए गए हैं, जबकि राज्य में पीक डिमांड की बिजली पहले से ही उपलब्ध है। सरकार हजारों करोड़ रुपये इन कंपनियों को बगैर एक यूनिट खरीदे दे रही हैं। कमोबेश सभी राज्यों में यही कहानी है। दूसरा केंद्रीय पूल की जेनको अलग अलग राज्यों को अलग अलग दरों पर बिजली बेचती हैं।
नीतीश कुमार ने इस विसंगति को 2017 में भी उठाया था, लेकिन वह बात बिहार विधानसभा में ही सिमट कर रह गई थी। स्वाभाविक है कि जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक रेल किराया दूरी के हिसाब से एकसमान होता है तो एक ग्रिड से बिजली की दरें अलग अलग क्यों हैं?
महंगी बिजली का गणित लागत एवं राजस्व की एक जटिल स्थापित प्रक्रिया के कारण भी आम आदमी की समझ से बाहर है। बिजली बिल दो हिस्सों से मिलकर बनता है। एक फिक्स्ड चार्ज और दूसरा एनर्जी चार्ज। फिक्स्ड चार्ज में उत्पादन, पारेषण, ट्रांसमिशन, मेंटेनेंस लागत एवं पूंजी पर रिटर्न वसूला जाता है, जबकि ऊर्जा प्रभार उपभोक्ताओं द्वारा वास्तविक बिजली खपत की कीमत पर आधारित होता है। फिक्स्ड चार्ज से जब डिस्कॉम की लागत नहीं निकल पाती है, तब कंपनियां ऊर्जा प्रभार बढ़ाने के विकल्प को चुनकर बिजली महंगी कर देती हैं। फिक्स्ड चार्ज का बोझ ट्रांसमिशन और पावर परचेज की अदूरदर्शिता के कारण बढ़ता जाता है। इसके अलावा, सरकारें चुनाव जीतने के लिए मुफ्तखोरी की जिन योजनाओं का सहारा लेती हैं, उनकी भरपाई समय पर नहीं करती हैं या करती ही नही हैं जिसके चलते डिस्कॉम के घाटे बढ़ते चले जाते हैं। नतीजन अधोसंरचना पर खर्च करने के लिए वितरण कंपनियों के पास धन नहीं रहता है और वे कर्ज के बोझ में धंस जाती हैं।
बिजली उपभोक्ताओं का वर्गीकरण भी एक मकडज़ाल से कम नहीं है। घरेलू, व्यावसायिक, औद्योगिक, कृषि उपभोक्ता जैसी करीब 18 भागों में उपभोक्ता बंटे हुए हैं और इनके अलग अलग स्लैब हैं। हर स्लैब पर बिजली की दरें अलग अलग हैं। जाहिर है बिजली वितरण एक ऐसा दुरूह तंत्र बना दिया गया है जिसमें आम उपभोक्ताओं को केवल बिजली बिल की रकम अदायगी से अधिक कुछ समझ नहीं आता है। सवाल यह भी है कि इस मकडज़ाल से उपभोक्ताओं को मुक्ति क्यों नहीं दी जा सकती है? इस मकडज़ाल ने बिजली के उपयोग को समावेशी बनाने से भी रोक रखा है जो अंतत: विकास के पैरामीटर्स को भी प्रभावित कर रहा है। केंद्र सरकार ने प्रस्तावित बिजली संशोधन कानून में सब्सिडी को सीधे उपभोक्ताओं के खातों में ट्रांसफर करने का प्रविधान किया है, लेकिन इस बिल का भी विरोध हो रहा है।
ऐसे में बेहतर होगा केंद्र और राज्य मिलकर सबसे पहले एक समान दरों पर सर्वानुमति निॢमत करें। सभी बिजली उत्पादन कंपनियों की बिजली एक समान दर पर डिस्कॉम को मिले और डिस्काम दिल्ली की तर्ज पर देश भर में एक समान स्लैब पर घरेलू बिजली उपलब्ध कराएं। ऐसा करने पर सरप्लस बिजली भारत के अंतिम व्यक्ति तक आसानी से पहुंच सकती है।
अफसरशाही ने डुबाए डिस्कॉम
ठीक 25 वर्ष पूर्व की बात है -मप्र के खजाने में जब कभी नकदी का संकट होता तो सरकार जबलपुर स्थित बिजली बोर्ड से उधार लेकर अपना रूटीन काम चलाया करती थी।यानी बिजली बोर्ड की माली हालत सरकार से अच्छी थी लेकिन आज मप्र की तीनों वितरण कम्पनियों का घाटा 52 हजार करोड़ से ज्यादा है।उप्र विधुत निगम बर्ष 2000 में 77 करोड़ के घाटे में था आज यह आंकड़ा 83 हजार करोड़ पहुँच गया है।बिहार में 47 हजार करोड़ है। छत्तीसगढ़ ,उड़ीसा,हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्णाटक हर राज्य में हजारों करोड़ से नीचे नही है यह आंकड़ा। देश भर के सभी डिस्कॉम घाटे को जोड़ दें तो यह करीब 10 लाख करोड़ के आसपास है।विधुत अधिनियम 2003 में संशोधन के मौजूदा प्रस्ताव का देश भर में विरोध हो रहा है। सभी राज्यों के बिजली इंजीनियर्स ने एक जुट होकर सरकार से न केवल इन संशोधन को वापिस लेने बल्कि सभी विधुत कम्पनियों को भंग कर पुरानी निगम अथवा बोर्ड व्यवस्था बहाल करने की मांग भी दोहराई है।इस प्रस्ताव के देश व्यापी विरोध का बुनियादी आधार 2003 के अधिनियम की व्यवहारिक विफलता ही है। जिसके अनुपालन में तत्कालीन बिजली बोर्डों को विघटित करके कम्पनियों में बदला गया।ताकि उत्पादन, पारेषण,और वितरण को व्यावसायिक और उपभोक्ता अधिकारों के मानकों पर व्यवस्थित किया जाए।लेकिन आज ये कम्पनीकरण प्रयोग पूरी तरह से असफल हो गया है।इसके मूल में अफ़सरशाही को देखा जाता है जिसने कम्पनीकरण के नाम पर स्थापना और प्रशासनिक खर्चे तो बेतहाशा बढ़ा लिए लेकिन जिस टेक्नोक्रेटिक,और प्रोफेशनल एप्रोच की आवश्यकता थी उसे अमल में नही लाया।पहले राज्यों में रेलवे की तर्ज पर एक स्वायत्तशासी निगम अथवा बोर्ड होता था। अब वितरण, पारेषण ,उत्पादन,मैनेजमेंट, ट्रेडिंग होल्डिंग कम्पनियां बनाकर सभी की कमान आईएएस अफसरों को दे दी।जिन्होंने सरकारी महकमों की तरह ही इन कम्पनियों को चलाया है। कम्पनीकरण के पीछे का सोच बिजली वितरण को विशुद्ध व्यावसायिक औऱ प्रतिस्पर्धी धरातल देना था ताकि उपभोक्ताओं को बेहतर विकल्प और सस्ती सुविधाएं सुनिश्चित हो। अनुभव इसके उलट कहानी कहते है एक तो देश के सभी सरकारी डिस्कॉम दिवाले की कगार पर है और दूसरी तरफ निजी बिजली कम्पनियां करोडों का मुनाफा कमा रही है। बिजली के खेल को समझने के लिए हमें विधुत अधिनियम 2003 की उस भावना को समझने की जरूरत है जो बुनियादी तौर पर निजीकरण की वकालत करती है। भारतीय विधुत अधिनियम1910 औऱ इंडियन इलेक्ट्रिक एक्ट 1948 बिजली क्षेत्र में किसी भी निजी भागीदारी को निषिद्ध करता था।एक लंबे कारपोरेट दबाब के बाद देश मे 2003 का एक्ट पारित कर निजीकरण की नींव रखी गई। इसके लिए नीतिगत निर्णय हुआ कि बिजली क्षेत्र को निजी कम्पनियां के हवाले किया जाएगा। नया फ़्रेंचाइजी मॉडल ईजाद किया गया। शर्त रखी गई कि बड़े बड़े बिजली बोर्डों के टुकड़े किये जायें और पूरी व्यवस्था को सरकारी धन से दुरुस्त किया जाएगा।ठीक वैसे ही जैसे कोई जर्जर मकान है उसे बेचने के लिए उसकी मरम्मत कराई जाती है। बोर्डो के टुकड़े कम्पनियों मे इसलिये किये गए ताकि बेहतर कमाई वाले इलाके चिन्हित हो सके।उदाहरण के लिए मप्र में सम्पन्न क्षेत्र मालवा की कम्पनी पश्चिम क्षेत्र बनाई गई उसका मुख्यालय इंदौर कर दिया गया। यूपी को सात वितरण कम्पनियों में बांट दिया गया। पहले केंद्रीय मदद, विश्वबैंक, जापान बैंक, एडीबी, जैसे वितीय संस्थानों से ऋण लेकर बुनियादी ढांचा सुदृढ़ीकरण पर हजारों करोड़ खर्च किये गए।एपीडीआरपी, आरईसी, सिस्टम स्ट्रेंथनिंग, जेबीआईसी, उदय, राजीव गांधी विधुतीकरण, दीनदयाल ग्राम ज्योति, एडीबी,आरएपीडीआरपी,फीडर सेपरेशन, उजाला जैसी भारी भरकम बजट वाली योजनाओं के जरिये करीब 8 लाख करोड़ रुपये पिछले 15 साल में इंफ्रस्ट्रक्चर पर खर्च किये जा चुके है। यह राशि राज्य और केंद्र ने अलग अलग एजेंसियों के जरिये व्यय की।दावा किया गया कि ढांचागत सुधार के बगैर बिजली क्षेत्र में कम्पनीमूलक प्रतिस्पर्धा नही हो पाएगी।इस काम के लिए भी निजी कम्पनियों को चुना गया। 2003 के कानून से पहले सभी बिजली निर्माण कार्य बोर्डों द्वारा सीमित ठेकेदारी के जरिये खुद किये जाते थे इसके लिए एसटीसी विंग हुआ करती थी। लेकिन 50 साल के सरकारी सिस्टम को हटाकर निजी कम्पनियों को हजारों करोड़ के टेंडर जारी किये।जो नेटवर्क सरकारी निगमों ने 50 साल में खड़ा किया। उससे दोगुनी 33 केवी, 11 केवी, एचटी, लाइनें, पावर और वितरण ट्रांसफारमर गांव, कस्बों में खड़े कर दिए गए। शहरी इलाकों में हजारों करोड़ के टेंडर पर रिनोवेशन, अपग्रेडेशन क्षमता बृद्धि के काम कराये गए।ये सभी टेंडर ग्लोबल और सेंट्रलाइज्ड प्रक्रिया अपनाकर बुलाये गए जिनके सर्वाधिकार आईएएस सीएमडीयों ने अपने पास रखे।विसंगति यह रही की इतना बड़ा नेटवर्क एक साथ खड़ा किया जाता रहा और इसके मेंटेनेंस के लिए कोई मानव संसाधन भर्ती नही किया गया।हजारों करोड़ की धनराशि के टेंडर बड़ी बड़ी कम्पनियों को उनकी सुविधा के अनुरूप बनाएं गए बिड और टेक्निकल अहर्ताओं को प्रयोजित कर अवार्ड किये गए।ठीक वैसे ही जैसे टेलीकॉम के लाइसेंस बगैर पूर्व अनुभव के बांटे गए ।मसलन गोदरेज और ऐसी ही तमाम कम्पनियों ने मप्र,बिहार,महाराष्ट्र, गुजरात में हजारों करोड़ के ग्रामीण विधुतीकरण और शहरी सुधार के टेंडर हासिल किए गए।जमीनी हकीकत यह रही कि टेक्निकल सुपरविजन का काम भी निजी कन्सल्टिंग फर्मों के हवाले रहा नतीजतन देश भर में किसी भी टेंडर के अनुरूप मानक काम नही हो सके।कम्पनियां फायदे के काम कर भाग गईं।।खासबात यह है कि कम्पनियों को ये टेंडर पांच साल में लाइन लॉस यानी विधुत चोरी को 15 फीसदी पर लाने की शर्त पर मिले थे लेकिन एक भी कम्पनी इस पर खरी नही उतरी।किसी डिस्कॉम का लाइन लॉस आज 45 फीसदी से कम नही है।जाहिर है करोडों के यह ढांचागत काम आईएएस अफसरों एवं बड़ी कम्पनियों के गठजोड़ को भेंट चढ़ डिस्कॉम के दिवाले निकाल गए।दूसरा पक्ष कम्पनियों के प्रशासनिक खर्चे बढ़ने का भी है।निगमों में कार्मिक,वाणिज्य, सदस्य पूरे राज्य के काम देखते थे लेकिन कम्पनी कल्चर के नाम पर हर अधीक्षण यंत्री कार्यालय में एच आर , आई टी मैनेजर, सीए, अकाउंट ऑफिसर,के अलावा बड़ी संख्या में नॉन टेक्नीकल लोगों की भर्तियां कर ली गई।इंजीनियर के पद नाम बदलकर प्रबंधक, महाप्रबंधक कर दिए और हर वितरण केंद्र पर लग्जरी गाड़ियां किराए पर उठा लीं गई।बिलिंग सॉफ्टवेयर के नाम पर करोड़ों के घोटाले हुए।कॉलसेंटर,कलेक्शन सेंटर, फ्यूज कॉल रिस्पॉन्स जैसे कामों पर भी बेतहाशा धन खर्च हुआ।ये सब कर्ज के बोझ में ही हुआ ताकि निजी कम्पनियों के लिये वितरण व्यवस्था बढ़िया बनाकर दी जा सके।महंगी बिजली खरीदी के अनुबंध भी निजी कम्पनियों से ऐसी शर्तों पर हुए है कि डिस्कॉम को दिवालिया होने से कोई भी नही बचा पाया।उधर सरकारों ने चुनावी खैरात के लिये भी बिजली को ही चुना।अब सरकार एक बार फिर विधुत अधिनियम 2003 में संशोधन करने जा रही है जो मूलतःनिजी कम्पनियों के हितों की ओर झुका है।बिजली मंत्री आरके सिंह ने लोकसभा मे इसे उपभोक्ताओं के हितों के अनुकूल बताया है लेकिन बुनियादी रूप से यह गांव,गरीब,और किसानों के विरुद्ध इसलिये है क्योंकि इसके तहत निजी कम्पनियां मुनाफे वाले बड़े उपभोक्ताओं को बिजली देकर टोरंट पावर आगरा की तरह पैसा बनायेंगी और सरकारी कम्पनी ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों,गरीबों,और आम उपभोक्ताओं को बिजली देगी जिससे वह केवल घाटे में ही चलेगी।क्रॉस सब्सिडी खत्म होने से उपभोक्ताओं को महंगी बिजली लेनी पड़ेगी। नोयडा,आगरा, दिल्ली की कम्पनियों के मुनाफे इस आशंका को प्रमाणित करते है।बेहतर होगा सरकार बिजली एक्ट में प्रतिगामी संशोधन वापिस ले और देश भर में बिजली बोर्डों की व्यवस्था को बहाल करें। बिजली को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। प्रबंधन से अफ़सरशाही का दखल भी खत्म किया जाए।वस्तुतः बिजली क्षेत्र में निजी कम्पनियों का दावा कानूनी तौर पर खारिज हो चुका है।सबसे पहले यह प्रयोग उड़ीसा में हुआ था जहां रिलायंस को पूरा सिस्टम ठेके पर उठाया गया था।कम्पनी वहां काम नही कर पाई।सरकार ने जुर्माना लगाया तो मामला कोर्ट में गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट से भी रिलायंस हार गई।इसके बाबजूद मौजूदा संसद में निजीकरण को बढ़ाने वाले संशोधन लंबित है।

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