मुरैना। गांव की उजियाली से छुटी हुई, टूटी हुई।
सड़क के रास्ते गांव से दूर जा रही हैं गायें।
बिना किसी आपदा , अकाल, आंधी , तूफां के
बिलखते , भूखे बच्चों के संग कंही दूर जा रही हैं गायें।
रात के दो बजे रहे हैं ,और मैं "बिस्मिल" सा।
अपने सुख के कवच में मौन की शर- शय्या पर
अनसुनी सिसकियों के बोझ तले , रोता हुआ।
जाने क्यूं जागता हूँ , जबकी दुनिया सोती है।
मुझको अबाज सी आती है कि मुझसे कुछ दूर।
जिसके दुर्योधन हैं सत्ता में वो गौ माता।
रोड़ के बीच की पट्टियों पे बिखरी हुई खून सनी।
बोटियों से लिपट के जार - जार रोती हैं।
वो जिनके महके दूध को गिरवी रख कर ही।
तुम्हारी देह बलिस्ट और बुद्धि तेज बनी।
लोक माता सड़कों पर है ! और लोकशाह बंगले में
कभी तो लौट कर वे ये हिसाब मांगेगी।
ये तड़पती माताएं , बिलखते हुए इनके बच्चे।
इनकी जमीं जोत कर अपनी तिजोड़ी भरने बालो।
कटे अंगूठों की नीवों पे खड़े हस्तिनापुर।
ये तेरी माएँ एक दिन तुझसे जबाब माँगेगी।
वर्तमान में गायों की मौत हुई बड़ी दुर्दशा हो रही है ये हमसे बहुत दूर जा रही है कंही ऐसा न हो कि दिवाली की गौ पूजा पर इनकी तस्वीर पर तिलक चंदन कर गौ पूजन की विधि सम्पन्न करनी पड़े।
कुॅं.रुद्रप्रताप सिंह रणबंका

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