( डॉ अजय खेमरिया, शिवपुरी)
कोविड संकट ने हमारे स्वास्थ्य ढांचे की तमाम विसंगतियों एवं कमियों को उजागर किया है।ऐसी ही एक विसंगति है देश की चिकित्सा शिक्षा में व्याप्त असमानता। जिन हिंदी भाषी राज्यों का प्रदर्शन मानव विकास सूचकांक में कमजोर रहता है वे चिकित्सा शिक्षा के मामले में भी दक्षिण के राज्यों से पिछड़े हुए हैं।पूर्वोत्तर के राज्य तो औऱ भी बुरी स्थिति में है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर देश के चारों कोनों में समान विकास की आवश्यकता को देश की सर्वांगीण प्रगति के लिए आवश्यक मानते है लेकिन जनस्वास्थ्य के मामले में यह असंतुलन आज भी गंभीर समस्या ही है।यह स्वाभाविक तथ्य है कि जिस राज्य में नागरिक आरोग्य की स्थिति होगी वहाँ विकास के सभी अवसर सुगम्य तो होंगे ही साथ ही राष्ट्रीय विकास में उन राज्यों की भूमिका अग्रणी होगी।सवाल यह है कि जन स्वास्थ्य के लिए सबसे अहम है चिकित्सा संस्थानों की उपलब्धता। इससे चिकित्सकों की उपलब्धता के साथ स्थानीय समाज के लिए भी आरोग्य की सहज स्थिति निर्मित रहती है।
सवाल यह है कि क्या भारत में चिकित्सा संस्थानों के मामले में एक स्थाई भेदभाव आरम्भ से बरकरार रहा है? स्वतंत्रता के बाद हमारी आबादी तो सात गुना से ज्यादा बढ़ गई लेकिन देश में अस्पताल दोगुने भी नही बढ़े हैं। पिछले पांच बर्षों में मोदी सरकार ने 145 नए मेडिकल कॉलेजों को खोलने की अनुमति दी है।आंकड़ो की नजर से देखें तो 1950 से 2014 के मध्य औसतन 6 मेडिकल कॉलेज प्रतिबर्ष देश में निर्मित हुए वहीं मोदी सरकार के पांच साल में यह आंकड़ा 29 नए कॉलेज प्रतिबर्ष आता है।2014 में देश के सभी मेडिकल कॉलेज में कुल 53348 एमबीबीएस सीट्स थी जिनकी संख्या अब 84649 हो गई है।पीजी सीट्स की संख्या 2014 में 23हजार थी जो आज 44 हजार है।16 नए एम्स श्रेणी के कॉलेज भी 2025 तक आरम्भ होने जा रहे है।कॉलेजों में अधिकतम दाखिले की संख्या 150 से बढ़ाकर 250 करने समेत आधारभूत सरंचनाओं एवं फैकल्टी के स्तर पर तमाम सुविधाजनक प्रावधान अमल में लाये जा रहे हैं। 65 बर्षों बाद संभव हो रही इस संख्यात्मक व्रद्धि का फायदा देश में समानुपातिक रूप से होना चाहिए लेकिन जमीनी हकीकत समावेशी उपलब्धता के नजरिये से बहुत ही निराशाजनक हैं। देश मे एमबीबीएस एवं पीजी सीट्स की संख्या में बढ़ोतरी एक खतरनाक असंतुलन औऱ खर्चीली स्वास्थ्य प्रणाली को भी जन्म दे रही है।सीटों की यह संख्यात्मक बढ़ोतरी देश में कुछ राज्यों के इर्दगिर्द सिमटी हुई है और तीन चौथाई राज्य इस नीतिगत सुधार के फायदों से वंचित हो रहे है।नतीजतन देश का आमआदमी मानक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए निजी क्षेत्र पर ही निर्भर है।संसद में पेश इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण के पांचवे हिस्से में इस बात का खुलासा किया गया है कि कैसे निजी क्षेत्र आम आदमी को महंगे उपचार के माध्यम से गरीबी के दलदल में धकेलता जा रहा है।कोरोना की दोनों लहरों में हमने देखा है कि कैसे निजी अस्पतालों ने लाखों के बिल मरीजों से वसूले हैं।एक सरकारी अध्ययन में बताया गया है कि देश की 7 फीसदी आबादी हर साल महंगे इलाज का भार नही उठा पाने के चलते गरीबी रेखा के दायरे में आ जाती है।देश के हर चौथे परिवार को स्वास्थ्य खर्च के लिए कर्ज लेना पड़ता है या अपनी संपति बेचनी पड़ती है।ध्यान से देखा जाए तो स्वास्थ्य क्षेत्र में इस शोषण का आधार अरसे से चली आ रही सरकारी नीतियां ही है।राज्य का विषय होने के कारण देश के चुनिंदा राज्यों ने संगठित तरीके से एलोपैथिक प्रणाली को अपने एक दुधारू सिंडिकेट के जरिये चलाने में सफलता हासिल कर रखी है।बीमारू राज्यों के अलावा पूर्वोत्तर के राज्य अपनी शासन औऱ राजनीति के न्यस्त एवं पुराने ढर्रे पर ही बने हुए है। दूसरी तरफ स्वास्थ्य संस्थानों के मामले में दक्षिण के छः राज्य आंध्रप्रदेश,तेलंगाना,कर्नाटक,केरल,तमिलनाडु,पॉन्डिचेरी के साथ महाराष्ट्र ने संख्यात्मक औऱ गुणात्मक दोनों मोर्चों पर दबदबा कायम कर लिया है।इन सात राज्यों ने देश की कुल स्वीकृत एमबीबीएस सीट्स में 48 प्रतिशत हिस्सा अपने यहां ले रखा है।यह संख्या महाराष्ट्र में 9180,आंध्रप्रदेश में 5317,कर्नाटक में 9445,केरल में 4305,तेलंगाना में 5265,तमिलनाडु 8025,पांडिचेरी 1530 है। देश के कुल 562 मेडिकल कॉलेज में से 276 निजी क्षेत्र के है। खासबात यह है कि इन 276 निजी कॉलेजों में से 165 तो इन सात राज्यों में ही स्थित है।एक औऱ दिलचस्प आंकड़ा यह है कि इन सात राज्यों में केवल 105 कॉलेज ही सरकारें चलाती हैं।यानी सरकार की भागीदारी निजी क्षेत्र की तुलना कम है।महाराष्ट्र समेत दक्षिण के इन राज्यों में मेडिकल कॉलेज एक इंडस्ट्री की तरह। निजी कॉलेज मालिकों एवं ,ट्रस्ट,एनजीओ जिनके माध्यम से निजी मेडिकल कॉलेज चलते है में इन राज्यों के शीर्ष राजनेताओं की भागीदारी सर्वविदित है। इसलिए यह माना जाना चाहिये कि इन राज्यों के पूँजीपति वर्ग ने स्वास्थ्य क्षेत्र के अपरिमित कारोबार को सबसे पहले समझ कर इसे अपने प्रभाव से विनियमित करा रखा है । सरकारों ने भी शांत भाव से यहां का स्वास्थ्य क्षेत्र निजी हाथों में सौंप दिया है।यह बताने की आवश्यकता नही है कि निजी मेडिकल कॉलेज किस वर्ग के लिए सुविधाजनक होते है और इनसे निकलने वाले डॉक्टर सामाजिक या सार्वजनिक सेवा के लिए कितने उपयुक्त होते है।इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात का भी खुलासा किया गया था कि देश के केवल 20 फीसदी डॉक्टर ही सरकारी सेवाओं में सलंग्न है।यानी महंगी चिकित्सा परिचर्या हमारे मौजूदा सिस्टम से ही खड़ी हो रही है।
अब तस्वीर का दूसरा पक्ष:जिन राज्यों को विकास के पैरामीटर्स पर फिसड्डी माना जाता है वहां मेडिकल एजुकेशन के मामले में पिछड़ापन 70 साल बाद भी कम नही हो पा रहा। बिहार,मप्र,छत्तीसगढ़,राजस्थान,दिल्ली,हरियाणा,झारखंड,उप्र,उत्तराखंड,हिमाचल,जैसे हिंदी भाषी 10 राज्यों की लगभग 65 करोड आबादी पर एमबीबीएस सीट्स की उपलब्धता केवल 30 फीसदी है।यहां एमबीबीएस की कुल सीट्स संख्या 25325 है। इसमें उप्र की 22 करोड आबादी पर 7975 सीट्स , बिहार की 11 करोड आबादी पर 2165,मप्र की 9 करोड़ आबादी पर 3885,राजस्थान में 4255,छत्तीसगढ़ 1345,हरियाणा 1785,हिमाचल 870,उत्तराखंड 850 झारखंड 880 सीट्स ही उपलब्ध है।इन राज्यों में कुल 176 मेडिकल कॉलेज है जिनमें 72 निजी एवं 104 सरकारी क्षेत्र के है।यानी महाराष्ट्र एवं छः दक्षिणी राज्यों के जितनी संख्या निजी कॉलेजों की है लगभग उतनी ही संख्या इन दस राज्यों में कुल मेडिकल कॉलेज की है।नगालैंड देश का ऐसा राज्य है जहां एक भी मेडिकल कॉलेज नही है। पिछले लोकसभा सत्र में सरकार ने अपने एक जबाब में यह जानकारी साझा की है।अंडमान,जम्मू कश्मीर,दादरा,असम,अरुणाचल,मणिपुर,गोवा मिजोरम,सिक्किम,त्रिपुरा,मेघालय मिलाकर 12 राज्यों में केवल 3257 एमबीबीएस सीट्स है।पश्चिम बंगाल,गुजरात,ओडिसा,पंजाब, में मिलाकर यह आंकड़ा 12900 है।गुजरात की लगभग 7 करोड़ आबादी पर जहाँ 5700 डॉक्टर्स के लिए प्रवेश मिलता है वहीं बंगाल में दस करोड़ पर यह आंकड़ा केवल 4025 ही है।लोकसभा में हाल ही में प्रस्तुत इन आंकड़ों से एक बात पूरी तरह स्पष्ट है कि देश में मेडिकल कॉलेजों का वितरण बुरी तरह से असंतुलन का शिकार है।स्वास्थ्य राज्य का विषय है लेकिन राज्यों में इसे लेकर समान प्रतिस्पर्धा नही है।जो राज्य लगातार मानव विकास सूचकांक में पिछड़े हुए है वे अपने यहां स्वास्थ्य संस्थानों को खड़ा करने में महाराष्ट्र औऱ दक्षिणी राज्यों की तुलना में बुरी तरह पिछड़ गए है।मोदी सरकार ने पिछले पांच बर्षों में इस असंतुलन को कम करने की पहल की है।जिन जिलों में कोई मेडिकल कॉलेज नही है वहाँ मौजूदा जिला अस्पतालों को संबद्ध अस्पताल मान्य कर मेडिकल कॉलेज के रूप में स्थापित किया जा रहा है।केंद्र प्रवर्तित योजना के तहत नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना एवं एमबीबीएस,पीजी सीट्स में व्रद्धि का काम चरणबद्ध तरीके से आरम्भ हुआ है।
असल में मेडिकल एजुकेशन का यह असंतुलन तभी दूर हो सकता है जब हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज के लक्ष्य पर नीतिगत निर्णय लिया जाए।डेढ़ लाख वेलनेस सेंटर्स की प्रमाणिक उपयोगिता डॉक्टर्स की अनुपलब्धता के चलते संदिग्ध ही रहेगी इसलिए व्यवहारिक समाधन 'वन डिस्ट्रिक वन कॉलेज' ही हो सकता है।इससे राज्यों के स्तर पर संस्थागत असंतुलन समाप्त होगा क्योंकि निजी मेडिकल कॉलेज अंततः इनके पूंजीपति मालिकों के लिए ही कुबेर साबित होते है।सरकारी जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज में तब्दील करने की नीति समावेशी स्वास्थ्य सेवाओं के नजरिये से कारगर साबित हो सकती है। कोविड संकट के सबक के तौर पर हमें देश में एक सर्वसुलभ स्वास्थ्य ढांचा खड़ा करना है तो मेडिकल शिक्षा को भी समावेशी बनाना पड़ेगा।ऐसा तभी संभव है जब सरकार अपने नियंत्रण वाले मेडिकल कॉलेजों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी करे और हर जिला अस्पताल को कॉलेज में बदलने के साथ ही वहां चार बर्षीय पीजी डिग्री की शुरुआत ब्रिटेन की तर्ज पर सुनिश्चित करे।इससे ग्रामीण औऱ कस्बाई क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता सहज होगी।अभी पीजी शिक्षा केवल बड़े शहरों में ही उपलब्ध है इसलिए एमबीबीएस के बाद कोई भी डॉक्टर गांव,कस्बों में नही रुकना चाहता है।सरकारी जिला अस्पतालों में चार साल की पीजी डिग्री आरम्भ होने से यह समस्या स्थाई रूप से हल हो सकेगी।
महात्मा गांधी कहते है "स्वास्थ्य ही वास्तविक पूंजी है न कि सोना चांदी के टुकड़े"

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