खनियांधाना। श्री पारसनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर मैं मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि संसारी जीव ब्रह्म स्वरूप अपने आत्मा के स्वभाव को छोड़कर भौतिक पदार्थों में अपने मन को लगाता है कभी अमूल्य पदार्थों का भक्षण करता है स्वरा पान आदि गंदे पदार्थों का सेवन करता है। गंदे गीतों को सुनता है इसलिए आत्मा के सच्चे स्वरूप को नहीं जान पाता जो संसार में आत्मा के स्वरूप को नहीं जानता है वह संसार के अनेकानेक पदार्थों को प्राप्ति करके भी संतुष्ट नहीं होता है धर्मात्मा व्यक्ति लाभ प्राप्त ना होने पर भी संतुष्ट होता है जबकि पापी व्यक्ति पर पदार्थों को प्राप्त ना कर पाने पर दुखी होता है। हम लोगों ने इस मनुष्य योनि को प्राप्त किया है भारत देश में जन्म लिया है जहां पर अनादि काल से ऋषि-मुनियों ने अध्यात्मिक गंगा को प्रवाहमान किया है। मुनि श्री ने कहा नारायण श्री कृष्ण जी ने भगवत गीता ग्रंथ में बताया कि जो "मान,मोहे, परिगृह" का त्याग करता है कामवासना से दूर रहता है । संसार के सुख-दुख से ऊपर उठ जाता है। वह अविनाशी "मोक्ष पद" को प्राप्त कर लेता है धर्म सभा में धर्म ग्रंथ समाधि तक के अध्ययन के उपरांत शंका समाधान का भी आकर्षक कार्यक्रम प्रतिदिन संपन्न होता है।

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