अच्छा बनना बुरी बात है मत बनना: कवि दिनेश वशिष्ठ
शिवपुरी। बज्मे उर्दू की मासिक काव्य गोष्ठी शहर की थीम रोड स्थित गांधी सेवाश्रम पर आयोजित की गई। इस काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता शकील नश्तर ने की लखन लाल खरे के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुई इस संगोष्ठी का संचालन सत्तार शिवपुरी ने किया,
गोष्टी का आगाज राधेश्याम परदेसी की भाव प्रधान रचना से हुआ उन्होंने कहा - आतिश ए इश्क दिल में जब लगती है बंदिशों की दीवारें ढह जाती हैं, सब कुछ मिल जाता है हाथ में फकत यादें रह जाती हैं,
डॉ संजय शाक्य ने कहा - आकर के अंजुमन की तू रौनक बढ़ा दे अब, थकने लगे चराग तेरे इंतजार में,
भगवान सिंह यादव को देखें उन्होंने कहा - भगवान करे इच्छा सब लोग निरोगी हैं, कुशाल बने जीवन हलकान न होना है,
राजकुमार चौहान ने होली के उपलक्ष में कुंडलियां और दोहे पढ़े एक दोहा देखें - गोरी दोनों हाथ में ले लो रंग गुलाल मौका है यह फाग का रंग दो सब के गाल,
वहीं सत्तार शिवपुरी ने भी होली गीत ‘‘ प्रियतम फिर ले आईयो बा होरी सौ रंग ‘‘ पढ़ा, उन्होंने ये भी कहा - लो फिर आ गया बसंत संग लेकर अपने हरियाली, नाच उठा पत्ता पत्ता झूम उठी डाली डाली
वरिष्ठ कवि दिनेश वशिष्ठ ने अच्छा बनने को बुरी बात बताते हुए कहा - तकलीफों की शुरुआत है मत बनना, अच्छा बनना बुरी बात है मत बनना,
डॉक्टर लखनलाल खरे ने चुनाव का जिक्र करते हुए कहा - जो जीते जलसे जुलूस के जश्न में वे डूब गए, जो हारे हैं वे कारण अभी तलाश रहे, दोनों दल हैं अति व्यस्त बताओ जनता किसके पास रहे, हास्य व्यंग के कवि अशोक जैन ने भी राजनीतिक परिदृश्य को रोमांटिक ढंग से प्रस्तुत किया जो बहुत सराहा गया।
तरही मिसरे पर रामकृष्ण मौर्य लिखते हैं - नजर के तीर से दिल ये कहीं घायल ना हो जाए तेरी यादों में दिल मेरा कभी पागल ना हो जाए
वहीं रफीक इशरत बज्म के सचिव ने कहा - तुम्हारे गीत गाता है मेरा होकर भी यह जालिम, मुझे डर है कि मेरा दिल तुम्हारा दिल ना हो जाए,
शकील नश्तर को देखें - सफर मैं भूल कर भी दिलजले को साथ मत रखना, कि जलकर खाक उसकी आह से मंजिल ना हो जाए,
अध्यक्षीय उद्बोधन के बाद सत्तार शिवपुरी ने सभी साहित्यकारों का आभार प्रकट कर शुक्रिया अदा किया।

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