खाईं गकरियां गाये गीत, ये चले चैतुआ मीत
हम सभी जानते हैं कि हमारे त्योहारों का संबंध मौसम से है और मौसम का संबंध सीधा फसलों से और फसलों का संबंध सीधा हमारी दाल रोटी से है। होली फागुन के महीने में आती है और इसलिए आती है कि इस समय हमारी रवि की फसलें पक कर तैयार होती हैं। गेंहू, चना, जौ, मसूर, अलसी सरसों आलू, मटर रवि मौसम की प्रमुख फसलें है।
हमारा देश कृषि प्रधान देश है। खेतों की हरियाली घर-घर में खुशहाली लाती है, बाजारों के चैहरे खिल जाते हैं। व्यापारियों के भाव बढ़ जाते हैं। आज जो चीजें वे सस्ते दामों पर अपने गोदामों में भरेंगे जब उनकी आवक कम हो जायेगी तब उसी को दोगुने, तीनगुने दामों में बेच कर अपनी जेबें भरेंगे।
बुंदेलखंड में घर-घर में अपने घर के द्वार पर जो गोबर की गुलरियां बना कर होली जलाई जाती है-उसमें गेंहूं की बालों को भूनते हुए परिक्रमा की जाती है तथा इस होली की आग में नये गेंहूं के गुथे हुये आटे से छोटी-छोटी मोटीसी हाथ की रोटियां बनाई जाती है। इन हाथ की रोटियों को गकरियां कहा जाता है। बुंदेलखंड से जो मजदूर मालवा में गेंहूं काटने आते हैं-उन्हें चैतुआ कहा जाता है। क्यों कि ये मजदूर गेहूं की पकी फसल काट कर चैत के महीने में अपने गांव और घर लौटते थे। पुराने समय में ये मजदूर समूह में पैदल ही घर लौटते थे तथा जहां शाम हो जाती थी वही रात्रि विश्राम करते थे, अपना भोजन बनाते थे, जिसमें रोटी के नाम पर ये गकरियां ही सेकी जाती थी। रात में समय बिताने के लिए गीत भी गाते थे। सड़क किनारे एक रात का डेरा। सुबह होते ही ये चैतुये अपनी कमाई और निजी उपयोग का सामान सर पर लादे अपनी मंजिल की पुनः चल पड़ते थे। इन्हीं चैतुओं के लिए यह कहावत प्रचलित थी-
खाई गकरियां गाये गीत, ये चले चैतुआ मीत।
मेरी जन्म-भूमि झांसी, बुंदेलखंड का प्रमुख नगर है। झांसी यह नाम महाकवि केशवदास ने दिया था। जब वे अपने आश्रयदाता महाराजा वीरसिंहजू के देव के साथ औरछा किले की किसी बुर्ज पर बैठे हुए थे। उन्हें उत्तर-दक्षिण दिशा में एक झांई-सी (परछांई-सी) दिखाई दी थी। यह झांई या छाया झांसी के निर्माणाधीन किले की थी। उन्होंने महाराजा से पूछा-महाराज यह झांई सी क्या दिखाई दे रही है। उत्तर मिला- वे वहां एक नया किला बनवा रहे हैं और चूंकी तुमने मुझसे पूछा है कि वह झांईसी क्या है तो आज से उसका नाम झांईसी हो गया। यही झांई-सी ही बाद में अपभ्रंश हो कर झांसी हो गया। झांसी मेरी जन्म-भूमि होने के कारण मेरे लिए मॉ की तरह प्रिय है। झांसी बुंदेलखंड का प्रमुख नगरी है। बुंदेलखंड जिसके भाग्य में भले ही अनादिकाल से प्रकृति ने दरिद्रता लिख दी है। यहां की मिटटी इतनी बंजर-ककरीली और पत्थरीली है, सूखी है कि यहां घास भी मुश्किल से पैदा होती है। तभी तो यहां के बारे में यह लोक कहावत प्रचलित है-
महुआ मेवा बेर कलेवा, गुलगुच बड़ी मिठाई,
ये तीनों चीजें चाने हो तो, चौरासी में करो सगाई।
(गुलगुच महुये का पका मीठा फल इसे गुलेंदा भी कहते हैं। महुये के फूल से केवल शराब ही नहीं बनती इससे अनेक पकवान भी बनाये जाते हैं। इन्हीं में एक पकवान ""महुआ का लटा"" के नाम से विख्यात है जो गुड़ तथा तिल से बनाया जाता है। चौरासी बुंदेलखंड के एक हिस्सा विशेष। यहां कभी 84 किले रहे होंगे। इस लिए इसे चौरासी का क्षेत्र कहा जाता है।)
....... तो मैं बात बुंदेल खंड की कर रहा था- बुंदेल खंड के लिये भले ही कहा जाता रहा हो- कि ‘‘सौ डंडी-एक बुंदेल खंडी‘‘ पर वास्तिविकता यह है कि यहां का प्रत्येक व्यक्ति संघर्षशील, परिश्रमी, ईमानदार, भोला-भला तथा सीधा-सादा होता है। (डंडी अर्थाथ उदंड, दंद-फंद करने वाला, अक्खड़) उसके मन में जो होता है वह उसके ओंठों पर होता है। उसका प्यार और गुस्सा दोंनों उसकी आंखों से ही नहीं शब्दों से भी झलकता है। उसे कुछ भी दबाना या छुपाना नहीं आता। गुलामी उसे स्वीकार नहीं। इसी लिए इस धरती पर मधुकरशाह ने जन्म लिया जिनके नाम पर बुंदेलखंड के दो नगर महूरानीपुर और टीकमगढ़ बसे हुए है। मधुकरशाह को ही अकबर ने टीकमशाह की उपाधि से विभूशित किया था। महान योद्धा चम्पतराय और उनके पुत्र छत्रसाल की वीरता की कीर्ति अखंड है-उनकी भूमि भी यही है और वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई, तात्याटोपे जैसे योद्धा भी तो इसी वीर-भूमि से संबंधित है। बुंदेल-खंड की स्वाभिमानी धरती आर्थिक रूप से गरीब है मगर सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत धनाड्य है।
मैं अपनी संस्कृति का अंध पुजारी हूं और वह इस लिए कि मेरी तो दाल-रोटी ही अपनी संस्कृति और लोक-कलाओं के शरणागत होने के कारण ही चली है। लोक-संस्कृति के सच्चे संवाहक हमारे लोक-कलाकारों होते हैं। कलापथक दल ने मुझे बहुत सारे लोक-कलाकार मित्र दिये हैं। इनमें दतिया से विनोद मिश्र, सागर से राजेन्द्र दुबे, देवी सिंह, छतरपुर से ब्रजकिशोर पटेरियां, जबलपुर से नरेश कश्यप और भी बहुतसे मित्र हैं जिनके नाम मैं मात्र सूची को बहुत लम्बा न खींचने के भय से नहीं दे पा रहा हूं। मैं अपने इन सभी कलाकार मित्रों का हृदय से सम्मान करता हूं और इन्हें बहुत प्यार भी करता हूं। बुंदेलखंड में एक कहावत और भी है-
झांसी गले की फांसी, दतिया गले का हार,
ललितपुर तब तक न छोड़िए, जब तक मिले उधार।
राजशाही के समय में दतिया और झांसी दो अलग-अलग राज्य थे। यह कहावत किसी दतियावासी ने ही गढ़ी होगी। क्योंकि ये दोनों सीमावर्ती राज्य कहीं न कहीं एक दूसरे से शत्रुता का भाव भी रखते होंगे। इसी लिए उसे झांसी गले की फांसी लगती होगी। पर इन दोनों पुराने राज्य में एक सांस्कृतिक सम्बंध रहा है। ओरछा के महाराजा वीरसिंह के सुपुत्र जुझारसिंह के अनुज कुंवर हरदौल की बहन कुंजा का विवाह दतियां के ही राजकुमार के साथ सम्पन्न हुआ था। अपनी मृत्यु के उपरांत भी अपनी भांजी के विवाह में भात पहनाने की घटना ने हरदौल को लोकदेवता की तरह प्रतिष्ठित कर दिया। औरछा जिस राज्य के राजा स्वंय राम है। मधुकरशाह की पत्नी जो परम राम भक्त थी वे इन्हें अयोध्या से ओरछा लेकर आई थी। ओरछा में भगवान राम की नहीं-राजा राम की जय बोली जाती है। भगवान राम को बाकायदा सशस्त्र पुलिस की आरती के समय सलामी दी जाती है। यहां भगवान राम, राजराम की तरह निवास करते हैं।
मैं पिछले लगभग एक साल तीन माह पूर्व इंदौर निवासी हो गया हूं। इंदौर मालवा की पुण्य-भूमि पर स्थित मध्य-प्रदेश का सबसे बड़ा नगर है। इसे मध्य-प्रदेश की बम्बई अब मुम्बई भी कहा जाता है। यह प्रदेश की सबसे बड़ी व्यापारिक, व्यवसायिक और औद्योगिक नगरी है। यहां के लोग केवल व्योपार ही नहीं करते है अपनी धरती, अपने धर्म और अपनी संस्कृति से प्यार भी करते हैं। मालवा के लिए कहा जाता है-
मालव धरती गहन गम्भीर,
पग-पग रोटी, डग-डग नीर।
बुंदेलखंड व मालवा की लोक-संस्कृति में बहुत अंतर है तो ढेरसी समानतायें हैं। इन दोनों लोक संस्कृति में एक जो सबसे बड़ी समानता है वह यह कि इनने पंजाबियों, बंगालियों या राजस्थानी लोक-संस्कृति की तरह अपनी संस्कृति को बाजार से नहीं जोड़ा है। मुझे लगता है 1947 में हुए भारत विभाजन का बहुत बड़ा लाभ पंजाबी संस्कृति को मिला है। देश के विभाजन के परिणाम स्वरूप अनेक पंजाबी परिवार पिशावर, लाहोर, करांची से पलायन करके दिल्ली होते हुए मुम्बई आ गए। वे अपने साथ अपनी लोक-संस्कृति भी लेकर आये। ओ.पी.नैयर, मोहम्मद रफी, पूरा का पूरा कपूर खानदान कितने नाम गिनाये जायें जो पंजाब की धरती से संबंधित है। ओ.पी.नैयर की तमाम धुनों पर पंजाबी लोक-गीतों व उनके धुनों की छाप है। आज भी जो तमाम फिल्मी गीत आ रहे हैं वे हिन्दी और उर्दू के कम पंजाबी के अधिक प्रतीत होते हैं। बंगाल केसुप्रसिद्ध संगीतकार एस.डी.वर्मन तो बाकायदा बंगाल के मछुआरों को अपना गुरु माना करते थे। सुनते हैं वे वर्ष में एक बार बंगाल अपनी जन्मभूमि पर अवश्य आते थे और बंगाली मछुआरों के मध्य रह कर अनेक लोक-धुनें सीख कर आते थे। गंगा जमुना और तीसरी कसम जैसी फिल्मों में बिहार की पुरविया लोक-भाषा के गीतों व लोक-धुनों की भरमार है। राजस्थानी लोक-संस्कृति व लोकगीतों व धुनों का उपयोग भी फिल्मों में भरपूर हुआ है। गुजरात के गरवा ने भी देश भर में इन फिल्मों के माध्यम से अपनी पहचान और लोकप्रियता बनाई है। मुम्बई तो महाराष्ट्र में है ही। वहां की लावणी को अगर हम जानते हैं और पहचानते हैं तो मात्र फिल्मों के माध्यम से ही। पर हमारे बुंदेलखंड के लोक-गीतों व लोक-धुनों का क्या? जो तेजी के साथ समाप्त होती जा रही हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से फिल्मी कलाकार राजा बुंदेला की प्रशंसा करना चाहूंगा कि वे इस दिशा में निरतर प्रयासरत है। खजुराहो महोत्सव में उनके द्वारा किये जा रहे प्रयासों की रिर्पोट में देश के वरिष्ठ पत्रकार और मेरे मित्र हरीश पाठक की लेखनी के माध्यम से पढ़ चुका हूं। मैं सुप्रसिद्ध संगीतकार स्व.श्री रविन्द्र जैन साहब की स्तुति भी करना चाहूंगा उन्होंने हमारे क्षेत्र बुंदेलखंड व व्रज प्रदेश की अनेक लोक-धुनों को अपने गीतों में लेकर उन्हें अमर बना दिया पर उनके बाद कौन? हमारी अति-वृद्ध लोक-संस्कृति शताब्दियों से बूढ़ी और बीमार है, लगातार उपेक्षा और अनादर की शिकार है। जिस भाषा और संस्कृति ने महाकवि तुलसीदास, महाकवि केशवदास, महाकवि बिहारी, साहित्य में आधुनिक काल के निर्माता महावीर प्रसाद द्विवेदी, देश के प्रथम राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त दिये उन्होंने ही अपनी मातृभाषा बुंदेली को छोड़ कर ब्रजभाषा या खड़ी बोली के चरण पखारे। तब बुदेली संस्कृति का यह हाल होना ही था। आज हमारे बुंदेलखंड के लोक गीत-होरी, रसिया, फाग, लेद, चौकड़िया फाग, कजरी, सपरी, लांगुरिया, माता की भेंटें, झूले के गीत, सावन के गीत, जन्मोत्सव में गाये जाने वाले गीत, विवाह उत्सव के गीत कहां है? कहां हैं? हमारे लोक नृत्य सैहरा (दीवारी नृत्य) लेंहगी, राई, बधाई और कहां हैं? हमारी तमाम लोक परम्परायें।
बुंदेलखंड की राई को अंतर-राष्ट्रीय सम्मान दिलाने वाले रामसहाय पांडे को इस बार पद्मश्री प्रदान किया गया। इसके लिए भारत सरकार का आभारी होना बनता है। रामसहाय पांडे के अलावा स्व.देशराज पटेरिया-लोकगीत गायक, प्रकाश यादव-राई, चुन्नीलाल रैकवार-ढिमरियाई ऐसे कलाकार है जो धीरे-धीरे गुमनामी के अंधेरे में गुम होते जा रहे हैं।
अंत में आईये अब कुछ बातें हमारे लोक-व्यंजनों की भी कर लेते हैं। हमारी गुजिया, पपड़ियां (बेसन व मैदा की), मीठे-नमकीन सकलपारे, तरह-तरह के लड्डू, गुलगुले, भजिए, महेरी, कढ़ी, माढ़े, मट्ठे, बरे, गकरियां, टिक्कर, राम-रोट, दाल-बाटी-चूरमा, मक्का, ज्वार, बाजरे की रोटियां, बाजरे का खीचड़ा और मीठा बाजरा, राम-भाजा, आम का पनहा और सन्नाटा, खट्टी मीठी कैरी तथा आंवले की लोंजियां, आज कहां है? सामूहिक भोंजों में बनने वाला खट्टा,मीठा,नमकीन तथा चिरपिरा मैंथीदाना, कहां हैं? वे तरह तरह के अथाने (अचार), कहां है? वे पापड़ और खीचले, तेल में तली हुई सूखी कचरियां, कहां है? वे बथुये के परांठे और रायते, तथा दाल की चुनी के परांठे, गेंहू-चने व जौ के सत्तू कहां विलुप्त हो गये हैं? गन्ने के रस की खीर खाये हुये एक युग बीत गया।
आज ऐसे ही तमाम तरह के स्वादिष्ट व पौष्टिक लोक व्यंजन धीरे-धीरे हमारी थाली से गायब हो गए हैं या होते जा रहे हैं। आज हमारे बच्चे अपनी तंदुरुस्ती को खराब करने वाले पिज्जा, वर्गर, नूडल्स, चाऊमिन, पाव-भाजी, सेंड-विच, होट-डॉग खा कर अपने आप को आधुनिक होने को प्रमाण-पत्र दे रहे हैं। उनकी आदतें बिगाड़ने में हमारी आधुनिकता की अंधी माताओ की भूमिका भी कुछ कम नहीं है। पालक, मैथी, सरसों, चौलई, बथुआ, मूली के पत्तों की भाजियां तो जैसे हमारे रसोई से गायब ही हो गई है। कौन जिम्मेदार है इसके लिए?
संयोग से मैंने अपनी पुत्री अदिति के साथ दिल्ली में अनेक ऐसे होटलों में खाना खाया है जहां आपको संबंधित प्रदेश के विशुद्ध लोक-व्यंजन ही परोसे जाते है-वह भी बहुत ऊंचे दामों पर। जितने लोग होटल के अंदर भोजन कर रहे होते हैं उससे अधिक होटल के बाहर इंतजार। दक्षिण भारत के नागरिकों ने तथा उत्तर भारत के अनेक राजस्थान व पंजाब जैसे प्रदेशों ने अपने व्यंजनों को भरपूर प्रचारित किया है। आज हम पंजाबी कुलचे, छोले बटूरे, तुदूरी रोटी बाजार में खाने जाते हैं। सरसों का साग और मक्के की रोटी वाले पंजाबी ढाबे व होटल पूरे भारत वर्ष में मिल जायेंगे फिर क्यों हमारे मालवा का दाल-बाफला या बुंदेल खंड की दाल-बाटी-चूरमा या बिहार का लिट्ठी-चौखा पूरे देश में अपनी अलग से पहचान नहीं बना सका है। आप विश्वास नहीं करेंगे जब सुदूर दक्षिण भारत की लम्बी यात्रा के बाद अचानक मदुरै में एक राजस्थानी भोजनालय दिखाई पड़ता है तो आंखें तथा मन कितनी प्रसन्नता के साथ कुलाचें भरने लगता है। इडली-डोसा-सांवर कभी-कभी बदलाव के आनंद के लिए ठीक है पर प्रति दिन, दोनों समय इनसे ही पेट भरने की स्थिति हो तब अपना भोजन तेज धूप में तपते रेगिस्तान मध्य प्यास से सूखते कंठ को अचानक मिली शीतल जल-धारा से कम नहीं प्रतीत होता। इस जल धारा के लिए आप पैसों का मुंह नहीं देखते।
हमारी अनेक बेटियां यू टयूब पर कुकिग-चैनल चला रही है। मेरा उनसे आग्रह है कि वे बुंदेल-खंड के इन विलुप्त लोक-व्यंजनों पर आधारित एप्पीसोड बनायें। अपनी माताओं, दादियों, नानियों से इनके बारे में जानकारी प्राप्त करें, इन्हें बनाना सीखें, इन्हें प्रमोट करें, इनकी मार्केटिंग करें। अपनी धरती, लोक संस्कृति तथा लोक व्यंजन से कट कर कहीं कोई हमारे बारे में भी ये ना कहे-
खाई गकरियां, गाये गीत,
ये चले चैतुआ मीत।
धन्यवाद विनोद मिश्रजी जो आपने हमारे विलुप्त होते लोक व्यंजनों का स्मरण कराया और पहली फुरसत में ही मैंने यह आलेख लिख दिया-आपके लिए। पुनः एक बार धन्यवाद-विनोद मिश्र, दतिया का-इस लेख की प्रेरणा के लिए।
अरुण अपेक्षित
19 मार्च 2022
इंदौर म.प्र.

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