ग्वालियर। साहित्यिक मंच की मासिक गोष्ठी आज आयोजित की गयी, जिसमें वरिष्ठ नवगीतकार श्री ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव का सम्मान मंच की ओर से किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष डॉ केशव पांडेय ने की। सर्वप्रथम अथितियों द्वारा माँ सरस्वती का माल्यार्पण कर गोष्ठी का शुभारंभ किया गया। किंकरपाल सिंह जादौन द्वारा सरस्वती वंदना प्रस्तुत की गई।
तत्पश्चात संस्था के अध्यक्ष डॉक्टर केशव पांडे एवं सचिव दीपक तोमर ने वरिष्ठ नवगीतकार श्री ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव का शाल श्रीफल से सम्मान किया गया। अपने उद्बोधन में डॉक्टर केशव पांडे ने साहित्यिक मंच के आगामी कार्यक्रमों के बारे में प्रकाश डाला।
इसके उपरांत गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए सरिता चौहान ने दोहे कुछ इस प्रकार कहे-- सपना देखा एक दिन मैंने आधी रात, मेघा आए घुमड़कर, खूब हुई बरसात।
सुरेन्द्र सिंह परिहार ने आध्यात्मिक अनुभव इस तरह साझा किये-- जब भागवत ग्रंथ सिर रख लिया फिर काहे का द्वन्द, कलश यात्रा दौर में उपजा अद्भुत आनंद।
श्री जगदीश गुप्त का आलेख इस प्रकार था – यह कोई गरीब का पेट नहीं ,जिस पर लात मारोगे तो रो कर रह जाएगा |यह तो चारा चोर अजगर गिरोह की तोंद पर लात मारी है , यह थोड़े सह जाएगा ,तेवर तो दिखाएगा।
आदित्य अंशुधर ने पढ़ा-- आज रंगीन नजारों की बात करता हूँ , खुश्क मौसम में बहारों की बात करता हूँ।
रेखा भदोरिया ने गीत पढ़ा ---घटा बनकर बरस जाऊँ, वो मौसम रवानी, मिटाने से नहीं मिटती वो साहस की कहानी , मैं नदिया की प्रबल धारा ,मुझे क्या बांध पाये जहर पीकर जो जीती है ,वही मीरा दीवानी हूँ।
वरिष्ठ गीतकार डाक्टर किंकर पाल सिंह जादौन ने गीत कुछ इस तरह पढ़ा -जीवन एक पखेरू कोई हो जैसे बिन पंख।
अनंगपाल सिंह भदौरिया ने पढ़ा
लिखो तो ध्यान लगता है ,लिखो तो ज्ञान बढ़ता है।विचारों का जमा अंदाज भी, अंदर उमगता है।वरिष्ठ नवगीतकार श्री ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव ने गोष्ठी का समापन कुछ इस तरह किया हो गए संबंध अब बाजार जैसे है, आज कल हम सिर्फ पत्राचार जैसे है।
गोष्ठी का संचालन सुरेन्द्रपाल सिंह कुशवाहा एवं आभार संस्था के सचिव श्री दीपक तोमर ने किया। इस अवसर पर भगवान सिंह कुशवाहा, शुभाशुषेन्दु श्रीवास्तव , प्रो डाक्टर अभिषेक श्रीवास्तव , अनिल सिंह भदौरिया एवं श्रीमती रजनी तोमर विशेष रूप से उपस्थित थे।

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