सनातन धर्म कहिये अथवा वैदिक धर्म अथवा हिन्दू धर्म कह लीजिये। इस धर्म में गुरु की महिमा का भरपूर गुणगान हुआ है। यहां तक कि गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश ष नहीं परमब्रह्म भी स्वीकार कर लिया गया है-
ऊॅ गरूर्ब्रह्मा,गुरूर्विष्णु,गुर्रूदेवो महेश्वर,
गुरूः साक्षात् परं ब्रह्मा, तस्मै श्री गुरवे नमः।
गुरु वह है जो मॉ की तरह लालन-पालन करे, पिता की तरह मार्ग दर्शन करे, ऐसे गुरु को मैं अपनी पूरी श्रद्धा और प्रज्ञा से युक्त होकर नमस्कार करता हूॅ-मातृवत् लालयित्री च,पितृवत मार्गदर्शिका,
नमोऽस्तु गुरूसत्तायै, श्रद्धा प्रज्ञायुता च या।
और इतना ही नहीं गु्रु की प्रतिमा अथवा छवि ध्यान का आधार है, पूजा के आधार गुरु के चरण है, गुरु के वाक्य मंत्र की तरह अर्थाथ मंत्रों का मूल हैं और मोक्ष का मूल गुरु की कृपा है-
ध्यान मूलं गुरोर्मूर्तिः पूजा मूलं गुरोः पद्म,
मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो कृपा।
गुरु के श्री चरणों में ऐसा कौन सा भक्त-कवि है जिसने अपनी आस्था, श्रृद्धा, भक्ति की पुष्पांजलि स्तुति और वंदनाओं के रूप में अर्पित न की हों।
डॉ. नगेन्द्र ने जिन्हें हिन्दी का प्रथम कवि माना है-सरहपाद। जिनका समय 690 ई. के आसपास माना जाता है तथा जिनकी भाषा भी पुरानी हिन्दी या अपभ्रंश है, वे भी गुरु की महिमा का गुणगान करते हुये लिखते हैं-
जीवंतह जो नउ जरइ, सो अजरामर होइ,
हिन्दी साहित्य के आदिकाल में सिद्धों,नाथों में भी गुरु शिष्य परम्परा का पालन होता रहा पर वीरगाथा काल में कवियों के मध्य जब अपने आश्रयदाता राजाओं की वंदना करने की होड़ चल रही हो तब गुरू की वंदना करने का होश किसे रहता है। कोई बड़ी बात नहीं है इस दौर में गुरु के प्रति कुछ परायापन आ गया हो। शायद इसी लिये युगान्तर कवि कबीर को कहना पड़ा-
कबिरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और,
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठै नहीं ठौर।
कबीर की परम्परा के कवि दादूदयाल कहते हैं की हृदय में ही मंदिर है और हृदय में ही मस्जिद है, यह गुरु ने समझा दिया है। अब व्यर्थ ही ईश्वर की तलाश में बाहर भटकना होगा-
यह मसीत यह देहरा, सतगुरु दिया दिखाइ,
अगर किसी को संत दादूदयाल जैसा गुरु प्राप्त हो जाये और शिष्य भी संत रज्जब की तरह हो तो गुरु का एक शब्द भी शिष्य का उद्धार करने के लिये पर्याप्त होता है। अर्थाथ गुरु के साथ शिष्य को भी सुपात्र होना आवश्यक है-
दादू जैसा गुरु मिले, शिष्य रज्जब सा जाण,
कबीर दास जी के परम शिष्य गरीबदास अपने गुरु की प्रशंसा करते हुये लिखते हैं-
ऐसा सतगुरु हम मिला, खोलै बज्र किवार,
अगम दीप कूॅ ले गया, जहां ब्रह्म दरबार।
सन 1760 के आस-पास राजस्थान की दो भक्त चचेरी बहिनें हुई हैं-दयाबाई और सहजोबाई। उन्होंने अपने गुरु चरनदास की महिमा में अनेक दोहे लिखे हैं। अपने एक दोहे में सहजो बाई लिखती है-
सहजो गुरु बहुतक फिरें, ज्ञान ध्यान सुधि नाहिं,
तार सकें नहि एककूं, गहे बहुत की बांहि।
अपने गुरु की कृपा और उपकार को स्वीकार करते हुये दयाबाई लिखती हैं-
अंधकूप जग में पड़ी, दया करम बस आय,
महाकवि तुलसीदास ने गुरु की महिमा और गरिमा को लेकर कई पद और दोहे लिखे हैं। रामचरित मानस में गुरु की वंदना करते हुये वे लिखते हैं-
बंदउॅ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नर रूप हरि,
महामोह तम पुंज, जासु बचन रवि कर निकर।
सिक्ख-सम्प्रदय तो पूरा का पूरा शिष्य और गुरु परम्परा पर ही आधारित धर्म है। गुरु अर्जनदेव की वाणी है-
गुरु दाता, समरथ गुरु, गुरु सभ महि रहिआ समाइ,
सिक्खों के अंतिम गुरु गुरु गोविंदसिंह ने व्यक्ति के स्थान पर ग्रंथ को ही गुरु मानने का आदेश दिया-
आगिया भई अकाल की, तभी चलाइयो पंथ,
सब सिक्खन को हुक्म है, गुरु मानियो ग्रंथ।
गुरु ग्रंथ जी मानिओ, प्रगट गुरां की देह,
जो प्रेमि कउ मिलवो चहै, खोज शब्द में लेह।
सच्चाई तो यही है कि ग्रंथ से अच्छा कोई गुरु हो ही नहीं सकता है। व्यक्ति में गुणों के साथ दोश होना स्वभाविक है पर ग्रंथ तो दोश-मुक्त ही होते हैं। इस लिये एक निर्दोश या दोश रहित गुरु तो ग्रंथ ही हो सकता है। अन्यथा किसी साधु,संत,महात्मा के स्थान पर परम्पिता परमेश्वर को ही अपना गुरु स्वीकार कर ले। आदि गुरु तो भगवान भोलेनाथ को ही माना जाता है। सावन का महीना भी भगवान भोलेनाथ का ही है तो क्यों न भगवान भोलेनाथ को ही गुरु मान कर उनकी वंदना कुछ इस तरह करें-
सत्श्रृटि तांडव रचयिता, नटराज राज नमो नमः
हे आदि गुरु शंकर पिता, नटराज राज नमो नमः।
अरुण अपेक्षित
ज्ञान शिला, सुपर सिटी

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