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धमाका साहित्य कॉर्नर: अब कहीं गुम -सी है मुस्कानें, दिखती है तो लगती है, बदली की धूप -सी..डॉ. सीमा शर्मा

शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

/ by Vipin Shukla Mama
_प्रियपापा_ 
        *मुस्कान का सच* 
अब कहीं गुम -सी है मुस्कानें,
दिखती है तो लगती है,
बदली की धूप -सी,
अब दबी- सी है ये मुस्कानेl

दरकती है जो होठों से,
तो लगै, छुपी- सी दर्द की खानें,
अब कहीं गुम -सी है मुस्काने l

मानो कर्ज ली हो,
जो चुकता ना होने के लिए करती है सौ बहाने,
अब कहीं गुम -सी है मुस्काने,

जीवन का है ये दुखद सत्य ,फिर क्यों?
आज भी ,राह निहारती है मेरी निगाहें,
अब कहीं गुम- सी है मुस्काने,

है मुझमें ही समाये आप, 
फिर भी ,स्पर्श के साक्ष्य का प्रमाण ,क्यों मांगती है मेरी बाहें?
अब कहीं गुम- सी है मुस्कानेl

समझाया था मुझे इतना
समझना ससुर में पिता अपना, फिर भी,
हूं जिसका अंश उसे खोजती है मेरी आंखें.....
अब कहीं गुम सी है मुस्काने
                     डॉ. सीमा शर्मा
                      हिंदी विभाग
(शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय ग्वालियर)

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