जयपुर-अजमेर के सेंट्रल जेल में बंद हैं। टाडा के ये 9 अभियुक्त राजस्थान हाईकोर्ट से लगातार पैरोल ले रहे हैं। देशभर में बम ब्लास्ट के 50 से ज्यादा मामलों के अभियुक्त डॉ. जलीस अंसारी उर्फ 'डॉ. बम', पाक प्रशिक्षित अबरे रहमत अंसारी सहित 9 अभियुक्त शामिल हैं। इनमें से 6 को हाईकोर्ट से 7 साल में 11 बार पैरोल मिली है। इनमें 3 बार तो 30-40 दिन की दी गई। इसी मामले में फजलुर्रहमान सूफी सहित 4 टाडा अभियुक्त जलीस अंसारी, अबरे रहमत अंसारी, मो. अफाक को 9 फरवरी 2023 को पैरोल मिली। इनमें जलीस व अबरे जयपुर में 1993 के टिफिन बम कांड में भी शामिल रहे थे। इस मामले में अजमेर की डेजिग्नेटेड कोर्ट ने 2012 में जलीस को 15 साल और अबरे रहमत को 20 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी। वहीं, राजधानी एक्सप्रेस बम ब्लास्ट मामले में इन सभी आरोपियों को अजमेर की टाडा कोर्ट उम्रकैद की सजा सुनाई थी और मई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी थी।
नाम: जलीस अंसारी उर्फ डॉ. बम
कृत्य : जयपुर धमाकों सहित 5 राज्यों में 50 बम ब्लास्ट में शामिल रहा है
पेशे से डॉक्टर, लेकिन क्लिनिक में बनाता था बम, चलाता था क्रश इंडिया मूवमेंट
पैरोल पर बाहर आ फरार हो चुका, फिर भी...
जेल से 30 दिन की फिर मिली पैरोल, आधार बताया- व्यवहार अच्छा है
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर राज्य ने नियम बनाए, हाईकोर्ट ने कहा- राज्य के नियम इन अभियुक्तों पर प्रभावी नहीं केन्द्र सरकार के पैरोल नियम व्यवस्थित नहीं होने से सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को पैरोल नियम बनाने को कहा था। राजस्थान सरकार ने 2021 में नए पैरोल नियम बनाए तो प्रावधान रखा कि टाडा अभियुक्तों को पैरोल नहीं दी जाए। जबकि हाईकोर्ट ने जिन 4 अभियुक्तों को पैरोल दी, उसमें कहा कि इनके मामले में राज्य के नहीं बल्कि केन्द्र के 1955 के नियम ही प्रभावी होंगे।
केन्द्र ने कहा था- आतंकवाद व जघन्य अपराध में नहीं दे सकते नियमित पैरोल गृह मंत्रालय ने सितंबर 2020 में पैरोल की गाइडलाइन संशोधित करते हुए कहा था कि ऐसे कैदी, जिनकी रिहाई से समाज या किसी खास व्यक्ति की सुरक्षा को खतरा हो, उन्हें फिलहाल पैरोल देने पर रोक लगाई जाए। मंत्रालय ने सभी राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि आतंकवाद व अन्य जघन्य अपराधों में शामिल अपराधियों को जेल से बाहर जाने की मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए।
- डॉ. योगेश गुप्ता व विकास सोमानी, अधिवक्ता, हाईकोर्ट
केंद्र-राज्य की मनाही, सुप्रीम कोर्ट भी पक्ष में नहीं... फिर भी पैरोल
फजलुर्रहमान सूफी: चार बार याचिका लगाई, 3 बार मिली। पत्नी को बीमार बता पहले 30 दिन की पैरोल ली। फिर पत्नी ने 40 दिन की दिलवाई। तर्क दिया- केंद्र के नियमों से पहले भी पैरोल मिली है, राज्य के नियम लागू नहीं होते । मोहम्मद अफाक खान: 9 फरवरी 2023 को अफाक को 40 दिन की पैरोल मिली। आधार यह था कि जेल में उसका व्यवहार अच्छा है। जलीस अंसारी: 9 फरवरी 2023 को पैरोल मिली। तर्क दिया- पहले मिली पैरोल का दुरुपयोग नहीं किया। व्यवहार भी अच्छा है। अशफाक: सात बार याचिका लगाई, 4 फरवरी 2021 में पैरोल मिली। दो याचिकाएं पेंडिंग। तर्क दिया - परिवार की जिम्मेदारी है, अन्य काम भी हैं। अबरे रहमत अंसारी: पैरोल के लिए चार बार याचिका लगाई। 90 साल के पिता की देखरेख के लिए 40 दिन की और जेल में अच्छे व्यवहार के आधार पर 30 दिन की पैरोल मिली। हबीब अहमद खां: छह बार याचिकाएं लगाई, इनमें से 3 बार पैरोल मिली। तर्क था - 93 साल काहं हार्ट पेशेंट हूं, इलाज लेना है। शमशुद्दीन, मो. एजाज अकबर, अशफाक की याचिकाएं पेंडिंग। शमशुद्दीन व एजाज की याचिका पर 6 जुलाई को सुनवाई होनी है। जबकि अशफाक की याचिका पर 27 जून को सुनवाई होनी है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था- आतंक फैलाने वाले
पैरोल के हकदार नहीं
टाडा में उम्रकैद भुगत रहे हसन मेहंदी शेख ने पत्नी की बीमारी के बहाने पैरोल मांगी थी । जनवरी 2023 में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने कहा था- देश में आतंक फैलाने वाले, टाडा के दोषी पैरोल के हकदार नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- हक के रूप में पैरोल का दावा संभव नहीं
हाईकोर्ट ने 1 मई 2016 को अशफाक को 20 दिन की पैरोल देने से मना कर दिया था। 11 सितंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था 'यह गंभीर व जघन्य अपराध का मामला है, जहां हक के रूप में पैरोल का दावा नहीं हो सकता।' बाद में 14 मई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अशफाक की मां की मृत्यु होने पर उसे 21 दिन की पैरोल दी थी।
राज्य : पैरोल देय नहीं, केंद्र : कोई मरणासन्न हो तो अधिकतम 15 दिन
राज्य: केन्द्र व सीबीआई के पूर्व विशेष लोक अभियोजक संजय महला कहते हैं- गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम-1967 व टाडा में सजायाफ्ता कैदियों को राज्य के नए नियम 2021 के तहत पैरोल नहीं दे सकते।
केन्द्र: आपराधिक मामलों के अधिवक्ता दीपक चौहान कहते हैं- केंद्र के 9 नवंबर 1955 के नियम में कैदी, उसके माता-पिता, पत्नी या बच्चों को गंभीर रोग से जीवन का खतरा हो तो भी 15 दिन से ज्यादा पैरोल नहीं।
सिर्फ सुप्रीम कोर्ट को अधिकार आर्टिकल 142 (अशफाक को मां की मौत पर पैरोल मिली) का उपयोग सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता है। तो भी वह नजीर नहीं बनेगा। हाईकोर्ट इसका उपयोग नहीं कर सकता।
-पानाचंद जैन, पूर्व जस्टिस, राज. हाईकोर्ट
(खबर साभार)

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