यहां वाइल्डलाइफ विशेषज्ञ डॉ. उत्तम यादव की देखरेख में उसका इलाज शुरू हुआ। उसकी ऐसी हालत क्यों थी इससे जानने के लिए खून, स्वाब, मल के नमूने जबलपुर के नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में भेजे गए। तीन दिन बाद उसकी रिपोर्ट में कैनाइन डिस्टेंपर संक्रमण (CDV) की पुष्टि हुई थी। एक हफ्ते तक वो इंदौर जू में रहा। इसके बाद भी उसने न तो कुछ खाया ना ही पानी पीया। इससे इलाज करने वाली टीम निराश हो गई थी। चिड़ियाघर के दूसरे जानवरों में भी संक्रमण का खतरा था। ऐसे में इंदौर जू प्रबंधन ने उसे वापस 3 सितंबर को सोनकच्छ ले जाने के लिए कहा। इसके बाद बीमार तेंदुए की तीमारदारी के लिए 12 लोगों की टीम बनाई। इसमें वनपाल गोपाल सिंह सेंधव, वनरक्षक अनिल कुमार लुनिया, रविंद्र सोनी, राजेंद्र वर्मा, सतपाल सिंह सेंधव, दौलत सिंह सोलंकी, रतनलाल आंवले, हिम्मत सिंह, अनार सिंह सेंधव, राधेश्याम मालवीय और कमलकिशोर पाठक को शामिल किया। इस टीम ने तेंदुए का नाम रखा 'रामू' ।
स्थानीय वेटरनरी डॉ. मानसिंह मालवीय भी टीम के सदस्य थे, जिन्होंने अपने पूरे करियर में पालतू पशुओं का इलाज किया था। उन्होंने बताया कि मैंने इससे पहले किसी जंगली जानवर का इलाज नहीं किया था। तेंदुआ कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) से संक्रमित था। इसके बारे में पता था, लेकिन इससे संक्रमित जानवर का इलाज पहले कभी नहीं किया था। तेंदुए को इंजेक्शन लगाना सबसे बड़ी चुनौती थी। उसके सिर पर भी घाव था।
मुर्गे पर झपट्टा मारा तो लगा अब ठीक
रेंजर डीएस चौहान बताते हैं कि इलाज शुरू होने के बाद उसके पिंजरे में पानी और अंडों
का घोल रखा जाता था। तेंदुआ उसकी तरफ देखता भी नहीं था। हमने धैर्य नहीं खोया। 8 सितंबर को पहली बार उसने पानी पीया। उसके बाद 9 सितंबर को अंडों का घोल पीया। इसी बीच हमने एक जिंदा मुर्गी को उसके पिंजरे में छोड़ दिया था ताकि वह उसे खा सके।
दो दिन तक वह मुर्गी उसके आसपास घूमती रही। 10 सितंबर को उसने पहली बार मुर्गी को पंजा मारा। उसका खून चाटा। उसके बाद टीम को लगने लगा कि अब वह ठीक हो जाएगा। 11 सितंबर को उसने मटन खाना शुरू कर दिया था। जैसे ही उसने ठोस आहार लेना शुरू किया हमने 14 सितंबर से बोतल चढ़ानी बंद कर दी।
ठीक होने में दो लाख का खर्च आया
तेंदुए का इलाज दो नवंबर तक जारी रहा। उसके खान-पान और देख रेख में कोई कोताही नहीं बरती गई। दिन में दो बार उसे खाने के लिए 6-6 किलो मटन दिया गया। इसके साथ खून, इलेक्ट्रॉल पाउडर और गुड़ का घोल भी दिया जाता रहा। इसी बीच नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय जबलपुर के विशेषज्ञों ने तेंदुए के नमूनों की दोबारा जांच की। उसमें कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) की निगेटिव रिपोर्ट मिली। इस रिपोर्ट के बाद वन विभाग ने तेंदुए को जंगल में शिफ्ट करने की तैयारी शुरू की।
वरिष्ठ अधिकारियों से अनुमति मिलने के बाद 18 दिसंबर को उसे देवास जिले के ही खिवनी अभयारण्य में छोड़ दिया गया।
अदभुद था इलाज
वेटरनरी डॉक्टर मानसिंह मालवीय कहते हैं कि मैंने अपने पूरे करियर में गाय-बैल, भैंस और बकरियों का इलाज किया है। तेंदुए जैसे जंगली जानवर का इलाज करने का अनुभव पहली बार हुआ। तेंदुए को इंजेक्शन लगाना, सलाइन चढ़ाना सबसे बड़ी चुनौती थी। पहली बार इंजेक्शन लगाने के लिए उसकी नस ही नहीं मिली थी, लेकिन वन विभाग के कर्मचारियों की मदद से इस मुश्किल काम को पूरा किया। जानलेवा संक्रमण के आखिरी स्टेज में कामयाब इलाज का ये देशभर में पहला मामला बताया जा रहा है।

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