डॉ. एच.पी.जैन ने उनके शिवपुरी आने के बाद की घटनाओं और संस्मरणों का उल्लेख करते हुए उनके रचनाकर्म की विविधता को दर्शाया। विनय प्रकाश नीरव ने कहा कि डॉ. विरही की कविताओं में युग जीवन की संवेदनाओं की पकड़ थी । उनके साहित्य में जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण मिलता है। दिनेश वशिष्ठ ने कहा कि विरही जी एक सच्चे शिक्षक, होने के साथ-साथ सहृदयी इंसान भी थे। सभी के साथ सहयोगी और मार्गदर्शक की भूमिका उन्हें सबसे अलग बनाती थी।
सुकून शिवपुरी ने उनकी उदारता, आत्मीयता व विनोदप्रियता के कई संस्मरण सुनाते हुए भावुक हो कर कहा कि-
बरस ही जाते हैं बादल तुम्हारी यादों के
बला का ज़ोर है दिल की घटाओं में अब भी
भले ही ओढ़ ली ख़ामोशी आप ने लेकिन
ठहाके गूंज रहे हैं फिज़ाओं में अब भी।
कवि राम पंडित ने कहा कि विरही जी के निधन से ऐसा लग रहा है कि जैसे हमने अपना सरपरस्त खो दिया है। युसुफ अहमद कुरेशी ने कहा कि विरही जी की हिंदी के साथ उर्दू साहित्य में भी गहरी रूचि थी। वे हमेशा उर्दू साहित्यकारों को भी प्रोत्साहित किया करते थे।
सभा में शकील नश्तर, सत्तार शिवपुरी, रफीक इशरत ग्वालियरी, त्रिलोचन जोशी, नीरज सुमन, राकेश भटनागर भ्रमर, राजकुमार चौहान, भारतीय, अजय जैन अविराम, राम कृष्ण मौर्य, राधे श्याम सोनी, देवेन्द्र शर्मा, चंद्रकांत मामा आदि ने भी अपने शब्द पुष्प अर्पित किये। अंत में सभी ने दो मिनिट का मौन धारण करते हुए उनकी आत्मिक शांति हेतु ईश्वर से प्रार्थना की ।

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