राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी (डीएसपी) ने सरकार के समक्ष स्थानांतरण और पदस्थापना की वर्तमान प्रक्रिया में प्रस्तावित संशोधन के प्रति अपनी गहरी चिंता और आपत्ति व्यक्त कराई हैं।
वर्तमान में डीएसपी की नियुक्ति और स्थानांतरण राज्य स्तर पर होती है, जो उनकी स्वायत्तता, निष्पक्षता और प्रशासनिक गरिमा को सुनिश्चित करता है। प्रस्तावित संशोधन के तहत यह अधिकार जिला स्तर पर पुलिस अधीक्षक (एसपी) को सौंपने की योजना है। हम इसे डीएसपी संवर्ग और समग्र पुलिस व्यवस्था के लिए हानिकारक मानते हैं।
प्रस्तावित संशोधन के संभावित दुष्प्रभाव
1. स्वायत्तता और गरिमा पर प्रभाव प्रशासनिक स्वतंत्रता का हनन: इससे डीएसपी संवर्ग की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होगी.राज्य पुलिस सेवा डीएसपी को राज्य-स्तरीय स्वायत्त संवर्ग के बजाय जिला-स्तरीय अधीनस्थ भूमिका में सीमित कर दिया जाएगा।
2. निष्पक्षता का संकट: जिला स्तर पर व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, पक्षपात या बाहरी राजनैतिक दबाव, डीएसपी की पदस्थापना को प्रभावित कर सकते हैं।इससे लिंगभेद, जातिभेद, क्षेत्रवाद एवं साधनसंपन्न एवं राजनीतिक रूप से सक्षम व्यक्तियों के द्वारा होने वाले भेदभाव को भी नकारा नहीं जा सकता. जिस प्रकार से कई महिला डिप्टी कलेक्टर अधिकतर ओआईसी की भूमिका में है इसी प्रकार से पुलिस विभाग में भी महिला पुलिस अधिकारियों के लिए भी लिंगभेद एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में सामने होगा. प्रशासनिक और सामाजिक प्रभाव राजनीतिक हस्तक्षेप का खतरा यह संशोधन पुलिस व्यवस्था में राजनीतिक दखल को बढ़ावा दे सकता है।भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद जैसी प्रथाएं शुरू हो सकती हैं. क्षेत्र के गंभीर अपराध विवेचनाओं में पक्षपात दबाव की स्थिति निर्मित हो सकती है.
3. कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था पर प्रभाव अनावश्यक स्थानांतरण की बार-बार ट्रांसफर से डीएसपी की स्थिरता और कार्यकुशलता प्रभावित होगी तथा क्षेत्र में अपनी दीर्घकालिक योजनाओं को कानून व्यवस्था के रूप में लागू करने में समस्या होगी। लगातार बदलाव से जिले में कानून-व्यवस्था बनाए रखना कठिन होगा, जिससे जन-सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।कार्य संस्कृति का क्षरण भय और दबाव का माहौल स्वस्थ कार्य वातावरण को नष्ट करेगा.
4. अधिकारों और कैरियर प्रगति पर प्रभाव वरिष्ठता और अनुभव की अनदेखी: डीएसपी की वरिष्ठता और प्रशासनिक अनुभव को दरकिनार कर मनमानी पदस्थापना हो सकती है जिसमें कैडर के अंदर ही असंतोष पैदा होगा.
5. मनोबल में कमी: असुरक्षित और पक्षपातपूर्ण माहौल से डीएसपी का उत्साह और समर्पण कम होगा, जो कनिष्ठ अधिकारियों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा.
6. डीएसपी और आईपीएस कैडर में तनाव : राज्य पुलिस सेवा और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के बीच पहले से कुछ विषयों पर मौजूद मतभेद इस बदलाव से और गहरा सकते हैं, जिससे असहयोग और तनाव बढ़ेगा.
7. कानूनी और संवैधानिक पुलिस अधिनियम का उल्लंघन: स्थानांतरण और पदस्थापना का अधिकार राज्य सरकार का विशेषाधिकार है। इसे जिला स्तर पर देना विधिक रूप से अनुचित है।
8. पुलिस सुधारों के विपरीत: सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले (2006) में स्थानांतरण में निष्पक्षता और पारदर्शिता के सिद्धांतों को रेखांकित किया गया था। यह प्रस्ताव इनके खिलाफ है।
9. प्रशासनिक और व्यावहारिक आधार राज्य की संप्रभुता का सम्मान: डीएसपी की पदस्थापना का केंद्रीकृत नियंत्रण राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में होना चाहिए। अन्य राज्यों में प्रचलन: केंद्र और अन्य राज्यों में डीएसपी की नियुक्ति राज्य स्तर पर होती है। यह बदलाव नकारात्मक उदाहरण स्थापित करेगा.
10. डिप्टी कलेक्टर से तुलना अनुचित: डीएसपी का कार्य कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण से जुड़ा है, जो डिप्टी कलेक्टर के राजस्व एवं प्रशासनिक कर्तव्यों से भिन्न है।
11. निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए पक्षपात का जोखिम: जिले के द्वारा स्थापना से व्यक्तिगत समीपता या दबाव आधार बन सकता है, जो राज्य-स्तरीय प्रक्रिया में कम होता है।
12. कैडर की एकता पर संकट: जिला-आधारित गुटबंदी से डीएसपी संवर्ग की एकता और मनोबल टूटेगा। रेगुलेशन के आधार पर वैसे ही अधिकार कुछ ही हाथों में संकेंद्रित और सीमित है अगर ऐसी स्थिति निर्मित होती है तो अधिकार विहीन उत्तरदायित्व की स्थिति निर्मित होगी.
14. जनहित और सुरक्षा के लिए कानून-व्यवस्था पर प्रभाव: स्वतंत्र और स्थिर डीएसपी ही प्रभावी पुलिसिंग सुनिश्चित करते हैं। यह प्रस्ताव जन-सुरक्षा को कमजोर करेगा।
15. राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एकरूपता: विकेंद्रीकरण से समन्वय की कमी होगी, जो आपात स्थिति में चुनौती बन सकती है। राज्य पुलिस अधिनियम और सेवा नियमावली के तहत स्थानांतरण का अधिकार राज्य स्तर पर ही होना चाहिए. प्रशासनिक संतुलन केंद्रीकृत प्रणाली निष्पक्षता, पारदर्शिता और स्थिरता सुनिश्चित करती है
चरणबद्ध कार्ययोजना
1: संगठनात्मक एकता और जागरूकता डीएसपी संवर्ग की बैठक: सभी अधिकारियों को एक मंच पर लाकर प्रस्ताव के दुष्प्रभावों पर चर्चा करें और सर्वसम्मति से विरोध का प्रस्ताव पारित करें।
2. संयुक्त बयान: एक औपचारिक बयान तैयार करें जिसमें तर्क और मांगें स्पष्ट हों।
3. वरिष्ठ अधिकारियों का समर्थन: सेवानिवृत्त और सक्रिय एसपीएस/रिटायर आईपीएस अधिकारियों से समर्थन जुटाएं।
4. औपचारिक प्रतिनिधित्व और पुलिस मुख्यालय को ज्ञापन: पुलिस महानिदेशक महोदय (DGP) को लिखित ज्ञापन सौंपें, जिसमें कानूनी उल्लंघन, दुष्प्रभाव और सुधार सुझाव शामिल हों।
4. राज्य गृह मंत्रालय और माननीय मुख्यमंत्री से संवाद, गृह सचिव, मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री महोदय को विस्तृत पत्र भेजें और व्यक्तिगत मुलाकात का प्रयास करना चाहिए।
5. प्रतिनिधिमंडल: डीएसपी संवर्ग का एक समूह उच्च अधिकारियों से मिलकर अपनी चिंताएं रखे क्योंकि इसमें वरिष्ठ अधिकारियों के हित और डीएसपी कैडर के हित दोनों अलग-अलग है इसलिए ज्यादा सहयोग की उम्मीद नहीं कर सकते हैं इसलिए एक बार वरिष्ठ संगठन स्तर से बात करने के बाद डीएसपी स्तर पर ही इन बातों को रखना ज्यादा उचित होगा।
चरण 3: वैकल्पिक संचार और जन-समर्थन मीडिया अभियान: समाचार पत्रों, सोशल मीडिया और विशेषज्ञों के माध्यम से इसे "पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता" से जोड़ना उचित होगा।
हितधारकों से संपर्क: माननीय जनप्रतिनिधियों विधायकों, सांसदों और गृह मंत्री से मिलकर इस विषय पर अवगत करावे एवं समर्थन मांगें।
चरण 4: निरंतर मुलाकात ज्ञापन और कानूनी तैयारी और पत्राचार: नियमित रूप से कानूनी रूप से शांतिपूर्ण प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपकर अपनी जायज मांग रखें।
कानूनी विकल्पों का अध्ययन: उच्च न्यायालय में याचिका की संभावना तलाशें ( अंतिम रूप में) कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श करें।
चरण 5: व्यक्तिगत और सामूहिक कार्रवाई (यदि संगठन समर्थन न दे) अनौपचारिक समूह: डीएसपी के बीच एकता बनाकर व्यक्तिगत स्तर पर प्रस्ताव का विरोध करें।
प्रतीकात्मक विरोध: नियमों के दायरे में सामूहिक अवकाश या शांतिपूर्ण प्रदर्शन जैसे कदमों पर विचार करें (लेकिन अंतिम उपाय के रूप में)।
चरण 6: कानूनी और अंतिम कार्रवाई न्यायालय में याचिका: यदि सभी प्रयास विफल हों, तो संवैधानिक और विधिक आधार पर प्रस्ताव को चुनौती दें।
निष्कर्ष
प्रस्तावित संशोधन डीएसपी संवर्ग की स्वायत्तता, गरिमा और कार्यकुशलता के लिए खतरा है। यह पुलिस व्यवस्था में असंतुलन, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप को बढ़ावा दे सकता है, जिसका अंतिम प्रभाव जन-सुरक्षा पर पड़ेगा। इसे रोकने के लिए संगठनात्मक एकता, तर्कसंगत अपील और चरणबद्ध कार्ययोजना आवश्यक है। हम शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने को प्रतिबद्ध हैं और आशा करते हैं कि सरकार इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करेगी। यदि सुनवाई न हुई, तो कानूनी मार्ग अपनाने के लिए भी तैयार रहना होगा। ये रणनीति राज्य पुलिस सेवा अधिकारी (डीएसपी संवर्ग) ने तैयार की है।

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